खेल - कूद

हिम्मत, संघर्ष और अनुशासन की पहचान हैं आखिरी भारतीय पारसी क्रिकेटर डायना एडुल्जी

इंग्लैंड
पारसियों ने भारत में क्रिकेट खेलने की शुरुआत की। 1892 में पारसियों और यूरोपियंस के बीच साल में दो बार खेले जाने वाले प्रेसीडेंसी मैच से भारत में क्रिकेट का प्रारंभ हुआ। 1907 से 1911 तक तीसरी टीम के जुड़ जाने से यह स्पर्धा त्रिकोणीय हो गई। यह तीसरी टीम हिंदुओं की थी। फिर 1912 से लेकर 1936 तक मुसलमानों की टीम को भी शरीक कर लिया गया।

अब भारतीय क्रिकेट स्पर्धा चतुष्कोणीय हो गई। जब 1937 में 'रेस्ट' नाम से पांचवीं टीम भी शामिल हो गई। इस तरह भारतीय क्रिकेट में पारसियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। इसी परंपरा को अबतक डायना एडुलजी भी निभातीं रहीं। पहले एक क्रिकेटर के तौर पर फिर बाद में बतौर क्रिकेट प्रशासक।

सौरव गांगुली के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद उस सीओए का 33 माह लंबा कार्यकाल भी खत्म हो गया, जिसकी डायना एडुलजी अहम सदस्य थीं। वो भारत की दूसरी पारसी महिला क्रिकेटर थी। उनकी बहन बहरुज और डायना के बाद पारसी समुदाय से कोई महिला क्रिकेट खिलाड़ी नहीं निकली।

पुरूष क्रिकेटरों में टीम इंडिया की ओर से खेलने वाले आखिरी पारसी फारूख इंजीनियर थे तो वहीं महिला क्रिकेट में ये काम डायना ने किया है और पुरुष-महिला को एकतरफ कर दें तो वो क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली आखिरी पारसी थीं।

26 जनवरी 1956 को जन्मीं डायना 70 के दशक की खिलाड़ी थीं। भारतीय टीम के लिए 20 टेस्ट और 34 वन-डे खेलने वाली यह महिला अपने दौर में कमाल की क्रिकेटर थी और पारसी ट्रेडिशन के विपरीत काफी चुस्त और दमखम वाली थीं, शायद इसलिए वो ऐसा कर पाईं। एडुलजी परिवार में पहले क्रिकेट खेलने की परंपरा रही थी और पारसी जिमखाना आकर इस खेल को देखने वाली डायना ने इस खेल में बड़ा नाम किया।

फरवरी 2017 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से नामित चार सदस्यों वाली समिति में डायना एडुलजी का जैसे ही नाम आया, उनके बारे में सब तरफ खबरे छपने लगीं और उनका फोन लगातार घनघनाने लगा था। लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों को लागू करवाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी।

समिति के अध्यक्ष पूर्व CAG विनोद राय, इतिहासकार रामचंद्र गुहा और बैंकर विक्रम लिमये थे। हालांकि बाद में गुहा और लिमये ने अलग-अलग कारणों के चलते अपना पद छोड़ दिया था। चार सदस्यों वाली समिति में डायना का आना इसलिए भी अहम था क्योंकि इन सदस्यों में वो एकमात्र क्रिकेट खिलाड़ी थी।

डायना एक सख्तमिजाज और काफी अनुशासनप्रिय महिला हैं। रेलवे में स्पोर्ट्स ऑफिसर रहने के दौरान उन्होनें रेलवे की महिला और पुरुष दोनों ही टीमों के लिए काम किया। क्रिकेट कोच विद्याधर पराडकर बताते हैं, 'रेलवे में क्रिकेट खिलाड़ियों को नौकरी दिलवाने का श्रेय उन्हीं को जाता है और वो काफी कड़ी ट्रेनिंग में विश्वास रखती हैं, उनके सामने खेलने वाले बच्चे उनका आदर भी करते हैं और उनसे डरते भी हैं।'

वो याद करते हुए बताते हैं कि रेलवे से खेल कर आए कुछ खिलाड़ियों के अनुसार डायना के कार्यकाल में अगर आप बिना इजाजत किसी मैच से छुट्टी लेते हैं तो भले ही आपकी शादी हो, मैच में तो आना पड़ेगा और शायद इसी अनुशासन का कमाल रहा कि भारत की राष्ट्रीय टीम में सालों साल रेलवे के खिलाड़ियों का दबदबा रहा।

पहले ही मैच के दौरान लगी चोट में डायना एडुलजी के आगे के चारों दांत टूट गए थे। पारसी ब्लॉगर सिमिन पटेल बताती हैं कि उस समय किसी महिला के लिए ऐसी चोट उसके पारिवारिक और सामाजिक जीवन को तबाह कर सकने वाली होती, लेकिन आंटी को इस बात से फर्क नहीं पड़ता था, वो न खेलने से घबराई और न ही पीछे हटी, वो चोट से उबरी और वापिस खेलने लगी।

भारत के लिए 1976 से 1993 तक 54 अंतराष्ट्रीय मैच खेलने वाली डायना के नाम भारत की ओर से महिला टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक 63 विकेट लेने का रिकॉर्ड है। इसके अलावा महिला क्रिकेट के दोनो फॉर्मेट में कुल 100 विकेट चटकाने वाली वो पहली भारतीय महिला भी हैं।

डायना हमेशा से ही भारत में महिला क्रिकेट को लेकर चले आ रहे ढुलमुल रवैए के खिलाफ आवाज उठाती रही। महिला क्रिकेटरों को कम मैच फीस, पुरुष खिलाड़ियों के मुकाबले कमतर होटलों में ठहराए जाने और कम सुविधाएं दिए जाने जैसी शिकायतों को उन्होनें हमेशा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया।

महिला क्रिकेट को उनका योगदान ये भी कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में भारत की सफलतम महिला गेंदबाज झूलन गोस्वामी को रेलवे में अपने कार्यकाल के दौरान डायना ने भी सिखाया है।

भारत की पहली महिला टेस्ट टीम का हिस्सा रही और एकदिवसीय क्रिकेट टीम की पहली कप्तान रही डायना का नाम इस लिस्ट में देखकर खेल पत्रकारों और खेल से जुड़े लोगों को हैरानी नहीं होती।

महिला क्रिकेट को मजबूत बनाने का दृढ़ संकल्प डायना ने तब लिया था जब वो बतौर कप्तान 1986 में इंग्लैंड के दौरे पर टेस्ट खेलने गई थीं और उन्हें क्रिकेटरों के लिए मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स मैदान के लॉर्ड्स क्लब में घुसने नहीं दिया गया था। दरअसल, उस समय क्लब के नियमों के अनुसार महिलाओं को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी जिसे अब सुधार कर महिला क्रिकेटरों के लिए खोल दिया गया है।

 

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