मध्य प्रदेश

प्रकृति की सुखद अनुभूति का प्रतीक है

भोपाल

प्रदेश में वन, वन्य-प्राणी और पर्यावरण के प्रति जागरूकता एवं प्रशिक्षण का वृहद अभियान ''अनुभूति कार्यक्रम'' एक संस्थागत रूप ले चुका है। लगभग 2 लाख 25 हजार विद्यार्थी इसमें भाग लेकर अपने क्षेत्र में वनदूत की भूमिका निभा रहे हैं। इसको मद्देनजर रखते हुए वन विभाग ने कार्यक्रम के लिये अलग से लोगो की आवश्यकता महसूस की। मध्यप्रदेश इको-पर्यटन विकास बोर्ड द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित लोगो प्रतियोगिता में 77 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं। उच्च-स्तरीय समिति द्वारा मूल्यांकन के बाद मुम्बई निवासी  वंशीलाल केतकी का डिजाईन, लोगो के लिये चुना गया।

इस लोगो में एक छात्रा हंसती हुई मुद्रा में दिखाई गई है, जो प्रकृति की सुखद ''अनुभूति'' का प्रतीक है। छात्रा के बालों में थलचर के रूप में हाथी और जलचर के रूप में मछली तथा गले के पास नभचर के रूप में पक्षी दर्शाया गया है। छात्रा की चोटी में टाईगर पगमार्क प्रदर्शित है, जो मध्यप्रदेश के टाईगर स्टेट होने के साथ पर्यावरण में बाघ की शीर्ष महत्ता को दर्शाता है। पत्तियों के रूप में बनाये गये हाथ, वनों को प्रदर्शित करते है। हाथों के नीचे कार्यक्रम के समन्वयक ईको पर्यटन विकास बोर्ड का लोगो है जो जल, भूमि और आकाश का प्रतीक है।

उल्लेखनीय है कि प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्यों के आस-पास रहने वाले बच्चों को वन और वन्य-प्राणी की पृथ्वी पर जीवन की महत्ता समझाने और इनके प्रति प्रत्यक्ष अनुभूति से एक लगाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से वन विभाग द्वारा कक्षा 7वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिये ईको कैम्प लगाये जा रहे हैं। 15 दिसम्बर से 15 जनवरी तक होने वाले इन कैम्प में विभिन्न कार्यक्रम और प्रतियोगिताएं होती हैं। स्कूली बच्चों और शिक्षकों द्वारा इसे बेहद पसन्द किया जा रहा है। इससे देश के प्रशिक्षित भावी नागरिक विश्व में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के बीच एक सुखद आस बन कर निकले हैं।

अनुभूति कार्यक्रम में इस वर्ष 1.11 लाख बच्चे

ईको पर्यटन विकास बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी  सुरेन्द्र सिंह राजपूत ने बताया कि इस वर्ष 15 दिसम्बर 2019 से 15 जनवरी 2020 के मध्य कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इसमें 1 लाख 11 हजार विद्यार्थी भाग लेंगे। अनुभूति कार्यक्रम में स्थानीय जन-प्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक भी काफी रूचि लेते हैं। बोर्ड द्वारा दिव्यांग बच्चों के जंगल कैम्प के लिये विशेष व्यवस्था की जाती है। ये बच्चे स्पर्श, सूंघने और दृश्य-श्रवण के माध्यम से न केवल एन्जॉए करते हैं बल्कि जंगल का बारीकी से अध्ययन भी करते हैं।

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