छत्तीसगढ़

कोरबा में हाथियों ने 4 किसानों का घर तोड़ा, 250 किलो अनाज बर्बाद, जान बचाकर भागे लोग

कोरबा
कोरबा (Korba) के कटघोरा वनमंडल के जटगा रेंज के ग्राम बासीन में पिछली रात हाथियों के दल ने काफी उत्पात मचाया. न सिर्फ मकानों को क्षति पहुंचाई बल्कि यहां रखे सैंकड़ों किलो अनाज और दलहन को भी चट कर गए. ग्रामीणों ने किसी तरह शासकीय भवन के पक्के छत पर चढ़कर अपनी जान बचाई. वन अमला हाथियों (Elephant) को खदेड़ने के साथ निगरानी रखे हुए है. जानकारी के अनुसार लगभग 32 हाथियों का दल लंबे समय से कटघोरा वनमंडल के विभिन्न वन परिक्षेत्र के जंगलों में घूम-घूमकर आसपास लगे गांवों में आतंक का पर्याय बना हुआ है.

पिछले 1 सप्ताह से किसी न किसी गांव में दल में शामिल 2 दंतैल हाथी पहुंचकर नुकसान कर रहे हैं. इसी क्रम में 17-18 मई की मध्य रात्रि हाथियों का दल जटगा रेंज के ग्राम बासीन में प्रवेश कर गया. 4 किसानों के घर को बुरी तरह उजाड़ने के साथ अनाज को काफी नुकसान पहुंचाया. बासीन बीट के ग्राम बोतली और इसके मोहल्ला डेमटी में हाथियों के एकाएक आने से ग्रामीणों में अफरा-तफरी मच गई. सुरक्षित ठिकाने की तलाश कर पक्के भवन के छत पर चढ़कर लोगों ने अपनी जान बचाई.

हाथियों को भगाने के लिए तरह-तरह के जतन ग्रामीण करते रहे. इस बीच हाथियों ने सोन सिंह के घर में रखे 19 कट्टी धान, 50 किलो अरहर दाल, जयसिंह के घर में रखे 20 बोरा धान, 2 बोरा चावल, 1 बोरा हिरवा दाल, 50 किलो अरहर दाल सहित आलमारी, मानसिंह  के घर में 18 कट्टी धान, 2 कट्टी चावल, 50 किलो अरहर दाल, मोहर सिंह  के घर में रखे 6 कट्टी धान, 50 किलो अरहर दाल व 50 किलो हिरवा को चट करने के साथ तहस-नहस कर दिया.

हाथियों की उत्पात की सूचना मिलते ही वन परिक्षेत्र अधिकारी एमएस मरकाम अपने कर्मियों और गजराज वाहन के साथ मौके पर पहुंचे. हालांकि तब तक हाथी वहां से जा चुके थे. ग्रामीणों के मकान और अनाज का व्यापक पैमाने पर हुए नुकसान का आंकलन विभाग द्वारा किया जा रहा है. मालूम हो कि इससे पहले 14 मई को पसान रेंज के ग्राम बनिया में आधी रात 4 ग्रामीणों का मकान 2 दंतैल हाथियों ने तोड़ा. 16 मई को ग्राम बासीन, जटगा में प्रवेश किए हाथियों से बचने के लिए ग्रामीणों ने शासकीय पंचायत भवन के छत पर चढ़कर रात बिताई. 17 मई को ग्राम बनिया के निकट पहाड़ में हाथियों के डेरा डालने की सूचना पर तेन्दूपत्ता और अन्य वनोपज के लिए जंगल जाने वाले ग्रामीणों को जान-माल का खतरा सता रहा है और वनोपज संग्रहण का कार्य भी प्रभावित होने लगा है.

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