जेल की चार दीवारियों से बाहर निकली मासूम की नजर जैसे ही कुत्ते-बिल्ली सहित अन्य पर पड़ी वह देखकर मुस्कुराते हुए सहज भाव से पूछा कि क्या यह कुत्ता है। कुछ ऐसे सवालों के बीच मासूम बच्ची जेल से महज 500 मीटर दूर संचालित बीएनपी स्कूल में पढ़ाई करने के लिए गुरुवार को पहुंच गई।

जहां छोटे-छोटे छात्र-छात्राओं के बीच पाकर वह भी अपने आप को उनके जैसा महसूस कर रही थी। दरअसल 4 वर्ष की बच्ची पिछले ढाई वर्ष से केन्द्रीय जेल रीवा में अपने माता-पिता के साथ है।

जेल प्रशासन के प्रयास पर उसे स्कूल में पढ़ाई करने के लिए न सिर्फ प्रवेश दिलाया गया बल्कि वह स्कूल ड्रेस पहनकर बैग में किताबें लेकर स्कूल भी पहुंच गई। केन्द्रीय जेल रीवा के इतिहास में यह पहला ऐसा निर्णय लिया गया है जब एक चार वर्षीय मासूम को उसे शिक्षा का अधिकार दिलाते हुए जेल प्रशासन ने जेल के बाहर की स्कूल में प्रवेश दिलाया है।

दो साल तक रहेगी जेल में

जेल नियम के तहत सजा काटने वाली माताओं को उनके 6 साल के आयु के बच्चों को रखने की परमिशन है। 6 वर्ष की आयु के बाद जेल प्रशासन नियम के तहत उसे जेल के अंदर नहीं रख पाएगा। ऐसी स्थिति में उसे अनाथालय भेजा जा सकता है।

माता-पिता अजीवन कारावास की काट रहे सजा

सिंगरौली जिले के बैढ़न निवासी मिश्रीलाल केवट और उनकी पत्नी चमेली केवट हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। जब उन्हें केन्द्रीय जेल रीवा में लाया था उस समय बच्ची की उम्र महज डेढ़ वर्ष की थी।

इनका कहना है....

बच्ची अब 4 वर्ष की हो गई है। जिसके चलते स्कूल में प्रवेश दिलाया गया है। जिससे वह पढ़ाई करके ज्ञान प्राप्त कर सके। यह पहली बच्ची है जिसे जेल के बाहर स्कूल में पढ़ाई करने का मौका मिल रहा है। - संतोष सोलंकी, जेल अधीक्षक, केन्द्रीय जेल,रीवा।