अंग्रेजी की एक उक्ति है ''Fisihing in troubled waters'' . मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पिछले दस सालों से प्रदेश में यही हर रहे हैं। यहाँ तक की उन्होंने इस कला में इतनी विशेषज्ञता पा ली है कि कई बार लगता है जैसे की वे किसी आपदा का इंतज़ार ही करते रहते हैं की कैसे वो आये ओर उसे अवसर में परिवर्तित करें ।

अब तो ऐसा महसूस होता है कि सरकार, पिछले 13 सालों से बजाय पुख्ता प्रशासनिक स्तर पर इंतज़ाम करने के कि बाढ़ और सूखा की स्थिति उतपन्न हो तो कैसे निबटा जाए, इस बात में ज्यादा रूचि लेती है की घटना के बाद उससे पैदा होने वाले जनता के गुस्से से कैसे निबटें।

याद करिये 2007 का रबी की फसल पर पड़ा पाला। उसके बाद 2008, 2010, 2012 फिर 2013 गाँव गाँव मुख्यमंत्री हेलीकाप्टर से घूमे खूब पटवारियों और सरकारी अमले को कोसा और कहा की ''हम पूरे नियम बदल देंगे और किसान को अधिक से अधिक मुआवज़ा मिलेगा'' ।पर क्या हुआ आज तक कई किसान चक्कर लगा रहे हैं।

ओला-पाला, सूखा, इल्ली-प्रकोप, शीत्-लहर, प्याज़ की अधिक पैदावार, हरदा में अतिवृष्टि और रेल हादसा, झाबुआ विस्फोट, उत्तराखंड आपदा, सिंहस्थ आंधी-तूफ़ान और हाल की सतना-रीवा की बाढ़ सब में मुख्यमंत्री चौहान तत्काल रातों-रात घटना स्थल पर पहुँच जाते हैं। टीवी पर दुखी मन से बयान पर बयान देते हैं। एक-एक आदमी के घर उसी समय बैठने जाते हैं। मातमपुर्सी करते हैं और लोगों को भावनात्मक मरहम लगाते हैं। लेकिन सब तात्कालिक।

उस समय प्रशासन जिसे लोगों की मदद के लिए लगना होता है वह सीएम साहब की सुरक्षा में लग जाता है। सीएम को ज़ेड केटेगरी की सुरक्षा का प्रोटोकॉल है। तंत्र अपनी आदत के मुताबिक सीएम को अच्छा लगे ऐसी चीज़े और काम करता है। यह स्वाभिक भी है।

इस सब में होता है कि लोगों का ध्यान सीएम के दौरे पर लग जाता है और तब तक आपदा को हुए कुछ समय बीत जाता है। बाद में आपदा-ग्रस्त लोगों को क्या मिलता है सब जानते हैं। प्रभावशाली लोग अपने अपनों के नांम लिस्ट में जुड़वाते हैं और पूरी राहत कुछ चुनिंदा परिवारों में बट जाती है। रही सही कसर सामग्री के नाम पर गेंहूँ में मिट्टी मिलाकर पूरी कर ली जाती है।

इसमें भी एक मज़ेदार तथ्य यह है कि शिवराज जी जाते वहीँ हैं जहां चुनाव होना होता है या बहुत ज़्यादा मीडिया-कवरेज की संभावना होती है। विश्वास नहीं है तो पूर्व के सभी दौरे और उसके आसपास होने वाले चुनावों की तारीख देख लें। अभी अब शहडोल में चुनाव है और वहीँ आस-पास के इलाकों में बाढ़ है। राहत के नाम पर बटने वाले पैसों का अगर विश्लेषण करेंगे तो उन्ही इलाकों में मात्रा जयादा रहेगी जहां वोटिंग होना हो। मेरा दावा है की इन तथ्यों को कोई झुठला नहीं सकता।

पिछले एक दशक में शिवराज सिंह ने चुनाव जीतने का यह जो मॉडल विकसित किया है वह निरंतर जीत के रूप में तो काम कर रहा है पर प्रदेश का कोई स्थायी भला नहीं कर रहा। भ्रष्टाचार के कारण मैहर में हाउसिंग बोर्ड की ईमारत के गिरने से एक क्रिकेटर की जान चली गयी। इमारात बाढ़ से नहीं भ्रष्टाचार से गिरी है।

मुख्यमंत्री बजाय प्रदेश के ठोस विकास और ज़रूरी मुद्दों से निबटने के इन्हीं सब भावनात्मक विषयों में लगे रहते हैं। उन्हें मज़ा इसी में आता है। यही कारण है कि कई सरकारी निर्णय सीएम के समय न दे पाने के कारण लंबित है। चाहे प्रदेश के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन का मामला हो या फिर सरकारी अस्पतालों को ठीक करने का सीएम के पास समय नहीं।

चूंकि मुख्यमंत्री को वल्लभ भवन में बैठना अच्छा नहीं लगता इसलिए अधिकारी भी उन्हें प्रदेश भर में दौड़ाये रखते हैं। प्रश्न यह है कि मुख्यमंत्री के पास पूरी प्रदेश सरकार का अमला है, मंत्रियों की टीम है और एक लाख 58 हज़ार करोड़ का बजट है फिर उन्हें उज्जैन में तसला-तगाड़ी लेकर क्यों खुद जुटना पड़ता है। उत्तर सीधा सा है पूरे प्रदेश का तंत्र भ्रस्टाचार के कारण चरमरा गया है और अधिकारी-कर्चारियों को पता है की सीएम का इस पर नियंत्रण नहीं हैं। ध्यान बांटने के लिए यह सब करना लाज़िमी है।

शिवराज जी आप एक चुनाव जिताने वाले लोकप्रिय नेता तो हो सकते हैं पर आप प्रशासन के लिए कभी याद नहीं किये जाओगे। दिग्विजय सिंह की तरह आपने भी अपना पूरा समय सामाजिक विषयों में खो दिया। मध्यप्रदेश वहीँ का वहीँ है। विश्वास नहीं तो बाकी राज्यों से तुलना कर लें।

Source ¦¦ पत्रकार अखिलेश उपाध्याय की फेसबुक वाल से साभार