भोपाल। मप्र का व्यापमं घोटाला केवल एक पॉलिटिकल हथियार बनकर रह गया है। इसके माध्यम से उन तमाम नेताओं और अधिकारियों को जेल भेज दिया गया जिन्हे एक विशेष केंप पसंद नहीं करता था। राजनीति का शिकार हुए नेताओं में प्रमुख हैं पूर्वमंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा। जमानत पर रिहाई के बाद तेजी से सक्रिय हुए पूर्वमंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा पर फिर से प्रेशर की पॉलिटिक्स शुरू हो गई है। 
 
व्यापमं घोटाले की कार्रवाई लगातार बदला लेने की राजनीति से प्रेरित दिखाई देती रही है। इसमें कई ऐसे दिग्गजों को बचाया गया जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत थे। इसके अलावा सबूतों से छेड़छाड़ के भी आरोप लगे। घोटाले के सरगना पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को बताया गया। कांग्रेस नेता संजीव सक्सेना, राज्यपाल के ओएसडी धनराज यादव, भरत मिश्रा, सुधीर शर्मा, मंत्री के पीए ओपी शुक्ला उनके साथियों में शामिल बताए गए। 
 
यह मामला भरे ही सीबीआई जांच की जद में आ गया हो परंतु राजनीति अब भी जारी है। सीबीआई ने इस मामले में बिल्कुल ऐसा प्रदर्शन नहीं किया जिसकी कि जनता और घोटाले का खुलासा करने वालों को उम्मीद थी। हार्डडिस्क टेंपरिंग की रिपोर्ट अब तक सीएफएसएल लटकाकर रखी गई है। माना जा रहा है कि यह केवल इसलिए ताकि सबको दवाब में रखा जा सके और इसका राजनैतिक लाभ लिया जा सके। लक्ष्मीकांत शर्मा सक्रिय हुए तो उन्हें वापस व्यापमं याद दिलाया जा रहा है, ताकि वो यूटर्न ले लें और वापस वेदपाठ करने लगें। एक बड़ा वर्ग नहीं चाहता कि लक्ष्मीकांत फिर से सक्रिय राजनीति में आएं। इसके लिए पहले भी मीडिया टूल्स का उपयोग किया गया था, फिर से वही प्रक्रिया शुरू हो गई है।