राजेश सिरोठिया .
किसी देश संविधान का महत्व उस राष्ट्र के लिए धर्म ग्रंथ से कम नहीं है। भारत के संदर्भ में यह भगवत गीता, कुरान और गुरू ग्रंथ साहिब से भी ऊपर है। इसलिए संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे संविधान की आत्मा, उसकी भावना की कद्र करें। संविधान के तौफिक (ताकत) को समझे। उसकी तौहीन (अपमान) न करें, लेकिन देखने में यह आ रहा है कि न तो लोग संविधान की कद्र कर रहे हैं और न ही संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों की उन्हें चिंता है। सबसे विकट हालात तो यह है कि खुद संवैधानिक पदों पर बैठे लोग जिन पर संविधान की मर्यादा बचाने की जिम्मेदारी है वे खुद भी उसकी तौहीन करने लगे हैं। संविधान और उसके तहत बने कानूनों की मर्यादा के अनुरूप आचरण तो दूर की बात, उसका माखौल उड़ाने से भी लोग बाज नहीं आ रहे हैं। वो क्या कर रहे हैं यह अलग मुद्दा है, लेकिन उनके व्यवहार से आम जनता के बीच क्या राय बन रही है इसकी परवाह भी उन्हें नहीं है। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अराजकता की ओर बढ़ रहे शासन प्रशासन तंत्र के बीच संवैधानिक संस्थाएं ही लोगों के मन में उम्मीदों का उजास पैदा करती हैं, लेकिन लोगों का भरोसा उन्हीं से उठने लगे तो हालात और विकट हो जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज फैजाउद्दीन भी यदि न्यायाधीशों की शुचिता पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो इस पर सभी को चिंतन करने की जरूरत है। यदि न्यायाधीशों को किसी सरकार से भेंट उपहार नहीं लेने चाहिए तो सरकारों को भी यह ध्यान रखना होगा कि वे मेजबानी के नाम पर अपनी ब्रांडिंग की कोशिश न करें। इसके पहले भी मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में कतिपय न्यायाधीशों को लेकर वकीलों ने जिस तरह से उंगलियां उठाई थीं वह भी चिंता की बात है। मध्यप्रदेश के संदर्भ में सवाल सिर्फ न्यायाधीशों तक सीमित नहीं है। विधायिका की गरिमा से भी जुड़ा है। प्रोटोकाल के तहत देश में प्रधानमंत्री के बाद लोकसभा स्पीकर और मुख्य न्यायाधीश आते हैं। प्रदेश के संदर्भ में इसी परिपाटी के मुताबिक मुख्यमंत्री के बाद दूसरे पायदान पर विधानसभा स्पीकर और मुख्य न्यायाधीश होते हैं, लेकिन प्रदेश में कुछ साल पहले इसी सरकार ने लोकायुक्त के ओहदे को स्पीकर के ऊपर और मुख्य न्यायाधीश के समकक्ष कर दिया। विधानसभा की समिति ने जब इस भूल की और इशारा करते हुए सरकार को भूल सुधारने की अनुशंसा दी थी तो सरकारी मुलाजिमों ने विधानसभा के इस प्रस्ताव से सिरे से खारिज कर दिया। अब सवाल यही है कि शासन का सामान्य प्रशासन विभाग या मुख्य सचिव विधानसभा या संवैधानिक पद पर बैठे स्पीकर से ऊपर हैं? अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों की सेवा शर्तों में यह साफ उल्लेखित है कि वे किसी ट्रेड यूनियन गतिविधि के सरपरस्त नहीं बनेंगे। लेकिन मध्यप्रदेश में तो आईएएस अफसर, कर्मचारी संगठनों के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर रहे हैं और मुख्यमंत्री सर्विस रूल की अनदेखी कर उनके साथ मंच साझा कर रहे हैं। पहले दिग्गी बाबू ने यह किया अब भैया शिवराज भी कर रहे हैं। एक जिले का कलेक्टर केन्द्रीय मंत्री को सर्किट हाउस में बिठाकर इंतजार करा रहा है तो राजधानी का एक अफसर मंत्रियों, विधायकों की बैठक बुलाकर मुख्य सचिव की बैठक के नाम पर गायब हो जाता है और उसका बाल भी बांका नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट मध्यप्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण की याचिका पर स्थगन आदेश देता है तो अफसर उसकी अनदेखी करके गुपचुप पदोन्नति कर देते हैं। प्रदेश का प्रथम नागरिक राज्यपाल व्यापमं के आरोपों का दंश झेल रहा है। आरोपों के बाद उसे राजभवन में इस कदर कैद कर रखा है कि वह अपनी संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की अगवानी का शिष्टाचार भी नहीं निभा पाता। कदाचरण के आरोपों की पड़ताल करने वाले लोकायुक्त का दमन खुद दागदार हो रहा है। लेकिन सरकार है कि उन्हें बनाए रखने पर मजबूर है। कार्यकाल पूरे होने के बावजूद या तो उनको ही सेवावृद्धि मिलेगी या फिर उनके किसी रिश्तेदार को यह पद सौंपने की बाध्यता खड़ी की जा रही है। क्या यह सब उचित है?

Source ¦¦ वरिष्ठ पत्रकार राजेश सिरोठिया की फेसबुक वाल से साभार