रुचि एस. काशिव, भोपाल। 'अमूमन शादी के बाद लड़कियां अपनी घर-गृहस्थी में रम जाती हैं। परिवार की जिम्मेदारियों को निभाती हैं। बच्चों के पैदाइश के बाद उनकी परवरिश में अपना वक्त बिताती हैं। बस, यहीं उसकी जिंदगी सिमट जाती है, लेकिन जिंदगी के जज्बे को जीने को उम्मीद की किरण उस वक्त मिल जाती है, जब कोई अपने आशीर्वाद के साथ प्रेरणा और संबल भी देता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मेरे ससुर ने कहा-तुम कर सकती हो, मैंने कोशिश की और कर दिखाया। अब मैं महिला व बाल विकास अधिकारी बनकर महिलाओं की उत्थान की दिशा में काम करूंगी और उन्हें प्रेरित भी करूंगी कि पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती।'

यह कहना है भोपाल की मालवीय नगर निवासी गृहिणी शुभा रितेश श्रीवास्तव का। शुभा का 2017 की एमपी पीएससी में महिला व बाल विकास अधिकारी के पद पर चयन हुआ है। शुभा की इस सफलता की कहानी के पीछे उनके ससुर विजय श्रीवास्तव का हाथ है। दरअसल, जबलपुर की मूल निवासी शुभा वर्ष 2007 में एमसीए करने के बाद शादी होकर भोपाल आ गई। पढ़ाई भी छूट गई और व ह गृहस्थी में रम गई।

दो बच्चे, 10 साल की बेटी और 7 साल का बेटा है। पति रितेश एक निजी क्षेत्र के बैंक में कार्यरत है। इस बीच दस साल का अरसा बीत गया। वह पढ़ाई लगभग भूल ही चुकी थी, लेकिन ससुर ने पीएससी की तैयारी के लिए प्रेरित किया। फिर मैंने वर्ष 2015 में तैयारी शुरू की। 2017 में परीक्षा में हिस्सा लिया और प्री के साथ मेंस क्लियर कर लिया। मेरा चयन बाल विकास परियोजना अधिकारी के तौर पर हुआ है।

परिवार ने बहुत मदद की

पीएससी की तैयारी में मेरे परिवार ने बहुत मदद की, जिसके बिना दोबारा पढ़ाई शुरू करना संभव नहीं था। टेक्नीकल फील्ड की छात्रा होने के कारण मुझे समझने में थोड़ा समय लगा, लेकिन 2017 में मैंने परीक्षा में हिस्सा लिया और प्री के साथ मेंस क्लियर किया। मुझे मेंस में 835 और इंटरव्यू में 94 मार्क्स मिले थे।

डेंगू के बावजूद दिया इंटरव्यू

शुभा कहती हैं कि नवंबर में इंटरव्यू के दौरान मुझे डेंगू हो गया था। बुखार 104 डिग्री तक था। डॉक्टर के मना करने बावजूद मैं इंटरव्यू देने गई। मेरे ससुर विजय कुमार श्रीवास्तव ने मुझे इस परीक्षा की तैयारी करने के लिए प्रोत्साहित किया। वे अक्सर कहते थे, कि मैं जानता हूं तुम यह कर सकती हो। मेरे पति रितेश ने बच्चों की जिम्मेदारी उठाई।