राजस्थान में ऐसे तो कई जिलों में किलों की अपनी विरासत और पहचान है, लेकिन प्रदेश के दूसरे बड़े जिले जोधपुर में साढ़े पांच सौ साल पुराने किलों में से मेहरानगढ़ किला आज भी दूसरे किलों से बेमिसाल है. यह किला पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है.

व्यापक रखरखाव और अपनी खूबसूरती के लिए जोधपुर का यह किला यहां के वासियों और पर्यटकों को भी अच्छा लगता ही है. साथ ही कला प्रेमियों की पसंद का केन्द्र है. एक साल में लगभग 11 लाख सैलानी इस किले को निहारते हैं.

125 मीटर ऊंचाई बना है किला

15वीं शताब्दी का विशालकाय जोधपुर का मेहरानगढ़ किला, पथरीली चट्टान के ऊपर जमीन से 125 मीटर ऊंचाई के ऊपर बना हुआ है. आठ दवाजों और अनगिनत बुर्जो सें युक्त दस किलोमीटर ऊंची दीवार से घिरा हुआ है. किले के अंदर भव्य महल, अदभुत नक्काशीदार गेट,जालीदार खिड़कियों और प्रेरणा देने वाला नाम है, जिसमें मोती महल, फूल महल, सिलेह खाना, दौलत खाना शामिल हैं. इन मेहलों में भारतीय राजवंशों के साज-सामान का विस्मयकारी संग्रह भरे हुए हैं.

पर्यटकों के लिए बना आकर्षण का केंद्र

मेहरानगढ़ दुर्ग की भव्यता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस किले को बार-बार देखने को जी चाहता है और जितनी बार देखो उतनी बार ही आकर्षण लगता है. इस मेहरानगढ़ किले को देखने के लिए देश के पर्यटक तो आते ही हैं. साथ ही विदेशी सैलानी भी इस किले की तारीफ करते थकते नहीं हैं. पड़ोसी राज्य के लोग तो खासकर इस किले को देखने आते हैं.

लगातार बढ़ रही पर्यटकों की संख्या

किले के निदेशक करणी सिंह जसोल का कहना है कि एक साल में लगभग 10 लाख भारतीय और 1 लाख विदेशी सैलानी इस किले को देखते हैं. यह संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. विदेशी सैलानी भी इस किले की खूब तारीफ करते हैं तो स्थानीय लोगों को भी यह किला खूब भाता है.

इस मंदिर का है खास महत्व

गौरतलब है कि राव जोधा संवत 1460 में मेहरानगढ़ किले के पास चामुंडा माता का मंदिर भी बनाया और मूर्ति की स्थापना की थी. मंदिर का दरवाजा आम आदमियों के लिए भी खोला गया है. चामुंडा माता खाली शासकों की नहीं बल्कि अधिकतर जोधपुर वासियों की कुलदेवी भी हैं और आज भी लाखों लोग इस देवी की पूजा करते हैं. नवरात्रों के दिनों में इस मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की जाती है. खास बात तो यह है कि देश-विदेश से आने वाले कोई भी पर्यटक इस किले को देखे बिना नहीं जाते है.