नई दिल्ली । पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बांटे जाने के मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने का लगातार प्रयास कर रहा है। जबकि वह खुद पिछले 70 वर्षों में कश्मीर के एक हिस्से में इस तरह के कई कदम उठा चुका है। कश्मीर का यह हिस्सा 1949 से ही अवैध रूप से पाकिस्तान के कब्जे में है। इस हिस्से को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) के नाम से भी जाना जाता है। पाकिस्तानी प्रशासन के मॉडल से वाकिफ सूत्रों ने बताया कि पीओके पर 1949 में अवैध रूप से कब्जा हासिल करने के दो साल बाद ही पाकिस्तान ने उसे दो अलग प्रशासनिक जोन में बांट दिया था। इसके एक हिस्से का नाम उसने कथित 'आजाद कश्मीर' और दूसरे हिस्से का नाम 'फेडरली एडमिनिस्ट्रेड नॉर्दर्न एरिया' रखा था। इसके बाद 1969 में पाकिस्तान ने 'फेडरली एडमिनिस्ट्रेड नॉर्दर्न एरिया' के लिए एक 'एडवाइजरी काउंसिल' का गठन किया। 1994 में इस एडवाइजरी काउंसिल को एक लीगल फ्रेमवर्क ऑर्डर के तहत 'नॉर्दर्न एरिया काउंसिल' में बदल दिया गया। इसके पांच वर्ष बाद पाकिस्तान ने लीगल फ्रेमवर्क (अमेंडमेंट) ऑर्डर पास किया, जिसके तहत 'नॉर्दर्न एरिया काउंसिल' को ‘नॉर्दर्न एरिया लेजेस्लेटिव काउंसिल’ में बदल दिया। बाद में इसे 2009 में गिलगिट- बाल्टिस्तान एंपावरमेंट एंड सेल्फ-गवर्नेंस ऑर्डर से बदल दिया। एक सूत्र ने बताया कि इस आदेश के तहत पाकिस्तान ने वहां एक 'विधानसभा' और एक 'गिलगिट-बाल्टिस्तान परिषद' का गठन किया है।
पाकिस्तान ने 2018 में गिलगिट-बाल्टिस्तान ऑर्डर में कुछ और बदलाव किए, जिसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को 63 से ज्यादा विषयों पर कानून बनाने का अधिकार और गिलगिट-बाल्टिस्तान विधानसभा से पास किसी भी कानून को रद्द करने का अधिकार शामिल है। सूत्रों ने बताया कि इसके साथ ही पाकिस्तान ने 2018 के ऑर्डर में किसी तरह का बदलाव करने की शक्ति को गिलगिट-बाल्टिस्तान की विधानसभा से छीनकर इसे पाकिस्तान के राष्ट्रपति के हाथों में दे दिया था। बंटवारे से पहले जम्मू-कश्मीर राजघराने ने 1927 में स्टेट सब्जेक्ट रूल बनाया था, जिसके तहत अन्य राज्यों के निवासियों को जम्मू-कश्मीर में बसने पर रोक थी। हालांकि, पाकिस्तान ने गिलगिट-बाल्टिस्तान में बाहरी लोगों को बसाने के लिए इस आदेश को निरस्त कर दिया। सूत्रों ने बताया कि उसने 'आजाद कश्मीर' में भी ऐसे ही कदम उठाए हैं।