इन्दौर । वैसे तो तीनों लोक के देवता और स्वामी भगवान ही है लेकिन परमात्मा का सही पता पाना है तो चार सूत्रों पर अमल करना पड़ेगा। इनमे सबसे पहला सूत्र है अपने मन में किसी के भी प्रति तिरस्कार या उपेक्षा का भाव नहीं रखें। तीन अन्य सूत्र हैं हमसे जितना संभव हो सकें, प्रत्येक जरूरतमंद की मदद करें, किसी भी जीव को पीड़ा नहीं पहुंचाए और हर समय प्रसन्न रहें। जहां ये चारों बातें होगी, भगवान वहीं मिलेगें। अपने मन को परख लें कि इन चारों मंत्रों में कहीं कोई कमी तो नहीं है। यदि हमारे परिचय वाले सर्कल में आने वाले सभी लोग हमसे मिल कर प्रसन्न रहते हैं तो समझ लें कि भगवान भी हमसे प्रसन्न हैं।  
 ये दिव्य विचार हैं राष्ट्र संत, पद्मविभूषण प.पू. आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. के, जो उन्हाने आज सुबह बिचैली हप्सी क्षेत्र स्थित प्रकृति कालोनी में तीन दिवसीय नूतन गृह जिनालय प्रतिष्ठा प्रसंग में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। ‘प्रभु यहां हैं’ विषय पर  आचार्यश्री ने कहा कि पहले यह तय करें कि हमें भगवान बनना है, भगवान से मिलना है या भगवान के बन कर रहना है। सबसे पहले हमें भगवान का बनना पड़ेगा। यदि हमें भगवान का बनना हैं तो किसी के भी प्रति तिरस्कार या उपेक्षा का भाव छोड़ना पड़ेगा। गेहूं साफ करने वाली बहने कंकर आने पर उसे अलग निकाल कर रख देती हैं, कंकर को तिरस्कार या घ्रणा से नहीं रखती। हमें भी यह समझना होगा कि संसार के सब जीव परमात्मा का ही परिवार है इसलिए किसी भी जीव के प्रति हृदय से तिरस्कार का भाव नहीं होना चाहिए। मंदिर में तो भगवान को हम विराजित करते हैं, वास्तव में भगवान तो हमारे हृदय में ही रहते हैं। जब तक हृदय से घृणा और तिरस्कार के भाव नहीं हटाएंगे, भगवान हृदय में केसे रहेंगे। भगवान वहीं रहना पसंद करेंगे, जहां हम अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद लोगों की मदद करेंगे। मदद भी सामने वाले के मांगने पर नहीं, मांगने से पहले ही करना चाहिए। सात दिन में एक बार या एक दिन में एक घंटे का समय यदि हम दूसरो की मदद के लिए निकाल सकें और किसी का जीवन बचाने या उसकी जरूरतें पुरी करने में काम आ सकें तो इससे भगवान भी प्रसन्न होंगे। घर में ज्यादा दूध, कपड़े सब्जी, रोटी आदि बच जाए तो उसे गरीबों को बुला कर अवश्य दें। घी तेल के खाली डिब्बे भी दूसरों के लिए बड़ा तोहफा बन सकते हैं यदि हम उन डिब्बों में अनाज, तेल या फल आदि भी दे सकें। जानबूझ कर यदि हम किसी को पीड़ा नहीं पहुंचाएं तो यह भी भगवान की प्रसन्नता का कारण बन सकता है। कुली से या रिक्शा तांगे वाले से कभी मोल भाव नहीं करें। वे अपनी मेहनत के बदले दो पैसे ज्यादा भी ले लें तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। बाजार में कई लोग हमारा लाखों रूपया ले कर बैठ जाते हैं तो इन कुली और हम्मालों को थोड़ा पैसा ज्यादा भी दें दे तो देना चाहिए। हम एयरपोर्ट, डाक्टर्स, पांच सितारा होटलों जैसी जगहों पर कोई मोल भाव नहीं करते तो फिर इन छोटे सेवकों के साथ भी नहीं करना चाहिए। भगवान की प्रसन्नता का चैथा मंत्र हैं कि हम हमेशा हर स्थिति में प्रसन्न रहें। भगवान की भक्ति का फल मन की प्रसन्नता ही है। यदि हमारे सर्कल के सब लोग हमसे मिल कर प्रसन्न रहते हैं तो समझ ले कि भगवान भी हम पर प्रसन्न हैं। जो किसी को पीड़ा या दुख नहीं देता भगवान उसी के हृदय में रहते हैं।    
 प्रारंभ में दीपक कोठारी, अपूर्व डोसी, मनीष सुराणा, शेखर गेलड़ा, पारस बम भरत कोठारी, वीरेंद्र कुमार जैन, अनिल रांका, संजय जैन आदि ने आचार्यश्री एवं साधु-साध्वी भगवंतों की अगवानी की। कार्यक्रम में प्राण प्रतिष्ठा का मुख्य महोत्सव सोमवार 8 जुलाई को सुबह 9 बजे से प्रारंभ होगा। आचार्यश्री की निश्रा में धर्म सभा के बाद प्राण प्रतिष्ठा होगी। चातुर्मास समिति के कल्पक गांधी के अनुसार सोमवार 8 जुलाई को भी आचार्यश्री प्रकृति कालोनी में सुबह 9 से 10 बजे तक धर्मसभा में ‘प्रभु से ही सारा जहां हैं’ विषय पर प्रवचन देंगे। 9 और 10 जुलाई को आचार्यश्री की स्थिरता कंचनबाग उपाश्रय पर रहेगी। आचार्यश्री का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश गुरूवार 11 जुलाई को कंचनबाग स्थित गांधी परिवार के निवास से प्रारंभ होकर रेसकोर्स रोड़ स्थित मोहता भवन पहुंचेगा।