इन्दौर । मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विशेषता उसके कर्म होते हैं। कर्म के आधार पर ही जीवन की सार्थकता तय होती है। गीता में भी भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कर्म का ही संदेश दिया है। संसार परिवर्तनशील है और मनुष्य का शरीर भी हमेशा एक जैसा नहीं रहेगा। संसार में हमारा अपना कुछ भी नहीं है, फिर भी हम ‘मेरा-तेरा’ के प्रपंच में जीवनभर उलझे रहते हैं। जीवन की धन्यता यही होगी कि हम अंतिम सांस तक उस परमात्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते रहें, जिसने हमें यह जीवन देकर अनमोल उपहार दिया है। कर्मों से ही हमारी पहचान बनेगी और श्रेष्ठ कर्मों से ही अगले जन्म का निर्धारण होगा। 
ये प्रेरक विचार हैं रामस्नेही संप्रदाय के तपोनिष्ठ संत, आचार्य राजस्थान के सींथल पीठाधीश्वर स्वामी क्षमाराम रामस्नेही के, जो उन्होंने आज सुबह गीता भवन सत्संग सभागृह में आयोजित विशेष प्रवचन के दौरान व्यक्त किए। प्रारंभ में समाजसेवी पवन सिंघानिया, कैलाश बिदासरिया, अरूण चोखानी, अमित किशनपुरिया, अंकित मित्तल, ओमप्रकाश पसारी, श्यामसुंदर बियाणी आदि ने आचार्यश्री का पूजन किया। मंगल कलशधारी महिलाओं ने व्यासपीठ की परिक्रमा की। गीता भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष गोपालदास मित्तल, मंत्री राम ऐरन एवं सत्संग समिति के संयोजक रामविलास राठी आदि ने आचार्यश्री की अगवानी की। सत्संग में बड़ी संख्या में शहर के धार्मिक-सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। आचार्यश्री ने 38 वर्ष पूर्व इंदौर यात्रा और ब्रम्हलीन आचार्यश्री रामकिशोरजी महाराज के साथ गीता भवन एवं अन्य धर्मस्थलों के सत्संग का भी उल्लेख किया। 
आचार्यश्री ने कहा कि शेर जंगल में अनेक जानवरों को मारकर भक्षण कर लेता है लेकिन उसे कोई पाप नहीं लगता जबकि हम किसी को एक पत्थर भी मार दें या मारने का सोंच भी लें तो पाप के भागीदार बन जाते हैं। भगवान ने हमें अपने स्वभाव के अनुरूप विभिन्न वर्णों में जन्म दिया है। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं ब्राम्हण वर्ण में जन्म लेकर यदि हम अपना कर्म छोड़कर दूसरे का कर्म करेंगे तो यह ठीक नहीं होगा। हमारा कर्म भले ही छोटा हो, दूसरों का भले ही ऊंचा हो, हमें अपने कर्तव्यों से पलायन नहीं करना चाहिए। दुर्लभ मनुष्य जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार है इसलिए अंतिम क्षणों तक अपने कर्तव्य और धर्म का पालन करते हुए यह जीवन देने वाले परमात्मा के प्रति शरणागति का भाव बनाए रखना चाहिए। 
आचार्यश्री आज गीता भवन में सत्संग के बाद उज्जैन के लिए प्रस्थित हो गए जहां महांकालेश्वर मंदिर में दर्शन के बाद रतलाम के लिए प्रस्थित हुए।