इन्दौर । संसार में प्रत्येक जीव ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। ज्ञान सरल है लेकिन उसके लिए पात्रता भी होना चाहिए। ज्ञान के साथ भक्ति की यात्रा में प्रवेश के लिए वैराग्य और विवेक भी चाहिए। विवेक सत्संग से तो मिलता ही है, लेकिन अनुभव से भी मिलता है। आजकल विवेक का बाहुल्य है और वैराग्य की कमी होती जा रही है। वह ज्ञान किसी काम का नहीं, जिससे किसी को कोई लाभ नहीं मिलता हो। ज्ञान वही सार्थक है जो हमारे संशयों को दूर कर सके। हमारे चिंतन और दृष्टिकोण को बदलने का काम ज्ञान ही करता है। विद्वता के साथ अहंकार नहीं होना चाहिए। 
ये दिव्य विचार हैं श्रीश्री माता आनंदमयी पीठ के अध्यक्ष स्वामी केदारनाथ महाराज के, जो उन्होंने आज ए.बी. रोड, एमजीएम मेडिकल कॉलेज के पास स्थित मां आनंदमयी आश्रम पर चल रहे मातृ जन्म महोत्सव के दौरान सत्संग सत्र में व्यक्त किए। सत्संग सभा में कैथल-हरियाणा से आए महामंडलेश्वर स्वामी विरागानंद महाराज, आल इंडिया मूवमेंट फार सेवा एम्स के स्वामी ऐश्वर्यानंद सरस्वती, उज्जैन के स्वामी परमानंद, स्वामी दिव्यानंद भारती, अमरकंटक से आए स्वामी मुक्तानंद आदि ने अपने प्रेरक विचार रखे। अतिथि संतों का स्वागत सुरेंद्रसिंह नीमखेड़ा, मुकेश कचोलिया, करतारसिंह, जे.पी. फडिया, अशोक बवेजा, सीके गोयल आदि ने किया। सत्संग का शुभारंभ स्वामी हंसानंद एवं स्वामी पूर्णानंद द्वारा मनोहारी भजनों के साथ हुआ। मंच का संचालन ब्रम्हचारी कृष्णानंद ने किया। इसके पूर्व सुबह महामंत्र संकीर्तन, परिक्रमा एवं मंगला आरती के बाद ध्यान योग में देश भर से आए सैंकड़ों साधकों ने भाग लिया। श्री वैष्णोदेवी, हनुमानजी एवं भैरवजी के रूद्राभिषेक पूजा-आरती एवं मातृ चालीसा के बाद सत्संग सत्र में मातृवाणी पाठ स्वामी केदारनाथ महाराज के सानिध्य में हुआ। अपरान्ह में सत्संग के दूसरे सत्र में भी योग, वेदांत एवं मातृ महिमा पर संतों ने प्रेरक विचार रखे। सांय 7.30 से 9 बजे तक आरती, संकीर्तन एवं तदपश्चात 15 मिनट के लिए मौन रखा गया। 
:: संतों के प्रवचन :: 
उज्जैन से आए स्वामी दिव्यानंद भारती ने कहा कि जीव स्वयं को एक सीमित सत्ता समझता है। महावाक्य सीमित से व्यापकता की ओर ले जाने वाला सूत्र है। जब हमारी दृष्टि ज्ञानमयी हो जाती है, तो सारे जगत में केवल परमात्मा ही दिखाई देने लगते हैं। अपनी चेतना को जब हम विराट रूप देंगे, तो परमात्मा के दर्शन भी उसी रूप में हो सकेंगे। ज्ञानी की दृष्टि नाम, रूप और उपाधि पर नहीं रहती। हमारी जैसी भावना होगी, अंतर्मन में मूरत भी वैसी ही स्थापित हो जाएगी। कैथल से आए महामंडलेश्वर स्वामी विरागानंद ने कहा कि ईश्वर बिंब है, और जीव प्रतिबिंब। हमारा ज्ञान मंद है, सम्यक नहीं है। परमार्थ के रास्ते पर चलना है तो छल-छिद्र और कपट का भाव छोडना ही पड़ेगा। वाणी भवानी का रूप है और अर्थ शंकर का। गुरू और शास्त्र के वचनों में श्रद्धा रखेंगे तो चैतन्यता बढेगी। काष्ठ में अग्रि की तरह आपके अंदर भी आत्म तत्व है लेकिन उसे जागृत करने के लिए किसी ज्ञानी, सिद्ध और संत पुरूष के सान्निध्य की जरूरत है। एम्स के स्वामी ऐश्वर्यानंद सरस्वती ने कहा कि जाने अनजाने में हुए पाप कर्मों से मुक्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य को पांच तरह के यज्ञ करना चाहिए। ये यज्ञ हैं- देव यज्ञ, ऋषि यज्ञ, पितृ यज्ञ, मनुष्य यज्ञ एवं पशु सेवा यज्ञ। देव यज्ञ में प्रतिदिन पूजा पाठ, भक्ति एवं आराधना के उपाय किए जाना चाहिए। ऋषि यज्ञ में धर्म ग्रंथों का मनन चिंतन करना चाहिए। पितृ यज्ञ में घर के बुजुर्गो की सेवा और उनका सम्मान करने का प्रावधान है। मनुष्य यज्ञ में दीन दुखियों की सेवा और उन्हें जरूरत के सामान भैंट करने जैसे सेवा कार्य करना चाहिए। पशु सेवा यज्ञ में प्रतिदिन गाय को आहार एवं पंक्षियों को दाना पानी देना चाहिए। ये सभी पंच महायज्ञ नियमित करना चाहिए, कभी कभार या एकाध दिन कर लेने से काम नहीं चलेगा। अमरकंटक से आए स्वामी मुक्तानंद ने गुरू दीक्षा का महत्व भी बताया। उन्होने कहा कि जीव को जिज्ञासु होना चाहिए। बिना जिज्ञासा के ज्ञान और भक्ति का आनंद नहीं मिलेगा। परमात्मा के दर्शन की तड़प भी जरूरी है। हम दूसरों के दोष देखने के बजाय यदि अपने दोष देख लें तो ज्यादा श्रेयस्कर होगा। उज्जैन के स्वामी परमानंद ने ज्योत से ज्योत जलाओ सतगुरू, मेरा अंतर तिमिर मिटाओ सदगुरू भजन सुनाया और कहा कि परमात्मा की सत्ता सर्वोपरि है। जहां भगवत चर्चा होती है, वह क्षेत्र ज्ञान की दैवीय शक्ति से आलोकित हो जाता है। पहले ज्ञान, फिर भक्ति और फिर मोक्ष-यहीं क्रम है। मन की वृत्तियों में जो कूड़ा करकट जमा हो गया है, उसे हटाना केवल ज्ञान से ही संभव है। अध्यक्षीय उद्बोधन में मातृ वाणी की व्याख्या करते हुए स्वामी केदारनाथ महाराज ने गुरू महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीव सभी वस्तुओं को अलग-अलग स्वरूप में देखता है, लेकिन यदि सबको एक ही अर्थात एकात्म दृष्टि से देखें तो यह भगवान की दृष्टि हो जाती है।  यह दृष्टि हमें गुरू से ही मिलेगी। बुद्धि के ज्ञान से वांछित समाधान नहीं मिलता। स्वयं का अनुभव होने पर ही समाधान होता है। जो क्रिया हमें भगवान से जोड़ दे, वह पुण्य और जो अलग कर दे वह पाप। भगवान का कोई निश्चित स्वरूप नहीं है। हम जैसा चाहे, भगवान उसी स्वरूप में नजर आ सकते हैं। अपने को पाना ही भगवान को पाना है। यह अदभुत चिंतन है। आत्म साक्षात्कार तभी संभव है, जब हम अपने ‘मैं’ को छोड़ दें। इस ‘मैं’ को हटाकर यदि ‘मैं हूं’ जोड़ लेंगे तो परमात्मा की अनुभूति शुरू हो जाएगी। इसी का नाम अपनी सत्ता को परमात्म सत्ता में विलय करना है। गुरू ही हमें मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। गुरू की महिमा अनंत है। 
:: आज समापन :: 
महोत्सव में बुधवार 22 मई को सुबह 3 से 5 बजे तक भगवान श्रीपूर्ण ब्रम्हनारायण का अभिषेक एवं पूजा आरती तथा 5 से 7 बजे तक विष्णु सहस्त्रनामार्चन एवं ललिता सहस्त्र नामार्चन के बाद 8 से 10 बजे तक हवन एवं कुमारी पूजा तथा 10 से 11 बजे तक मातृ चालीसा एवं महाआरती के बाद 11 से 12 बजे तक वेदातं संत सम्मेलन में आए संतो के आशीर्वचन होंगे। दोपहर 12 बजे से साधु भंडारा एवं महाप्रसादी के साथ मातृ जन्मदिवस महोत्सव का समापन होगा। इस अवसर पर शहर के विज्ञान आश्रम, अखंडधाम आश्रम, परमधाम, श्रीराम मंदिर, श्री श्रीविद्याधाम, आनंद भवन, भीमपुरा, श्रीराम धाम एवं अन्य आश्रमों के संत महापुरूष भी विशेष रूप से उपस्थित रहेगें। इसे भगवान पूर्ण ब्रम्ह नारायण के प्राकटय दिवस के रूप में मनाया जाएगा।  सांय 7.30 से 9 बजे तक आरती, संकीर्तन एवं 8.45 से 9 बजे तक मौन का आयोजन होगा।