नई दिल्ली । 'वाइटैलिटी' मतलब जैवीयता यानी विटमिन नहीं मिले, तो शरीर नहीं चल सकेगा। उनका कोई विकल्प नहीं। उन्हें हम अपने शरीर में बना नहीं सकते। ऐसे में बाहर से विटमिन लेने के सिवाय कोई चारा नहीं। जरूरी नहीं हर विटमिन जो आपके लिए हो, वह हर जीव के लिए भी विटमिन ही हो। बहुत से जानवर अपने शरीर में विटमिन-सी का निर्माण कर लेते हैं। अतः यह उनके लिए विटमिन नहीं है। लेकिन मनुष्य का शरीर विटमिन-सी नहीं बना सकता। उन्हें उसे बाहर से भोजन में लेना ही होगा। अगर नहीं मिला, तो उसकी कमी से स्कर्वी रोग हो सकता है। 
विटमिन बी-12 संरचना के तौर पर सबसे जटिल है। इसमें एक दुर्लभ तत्व कोबाल्ट होता है। यह ऐसा विटमिन है जो कोई जीव-जन्तु या पेड़-पौधे बना ही नहीं सकते। इसका निर्माण कुदरत ने केवल जीवाणुओं को सिखाया है। वे ही इसे बनाते हैं और सब तक यह पहुंचते हैं। गाय का ही उदाहरण लेते हैं। गाय घास खाती है। वह अधी चबाई घास उसके उस पेट (आमाशय) में जाती है। जिसके चार कक्ष हैं। फुर्सत में वह उसी घास की जुगाली करती है। दिलचस्प यह है कि गाय के पेट में अरबों जीवाणु होते हैं जो विटमिन बी-12 बनाते हैं। पाचक-रसों में सने घास के निवाले आंतों में पहुंचते हैं। वहीं से रक्त में अवशोषित हो जाते हैं। अब अपनी-हमारी बात। अव्वल तो आप और हम हर पत्ती-पौधा-फल धोकर खाते हैं। इससे सतह के जीवाणु साफ हो जाते हैं। फिर हमारे आमाशय में जीवाणुओं की वैसी व्यवस्था नहीं। तो इस तरह जब भोजन पचकर छोटी आंत पहुंचता है, तो उसमें विटमिन बी-12 नहीं होता। प्रकृति के सभी सदस्यों ने अपने बचाव के लिए कोई न कोई युक्ति गढ़ ली है। केवल इंसान को अपना इंतजाम करना है। किसी पौधे-पत्ते-बूटे-फल-सलाद को खाकर आपको बी-12 नहीं मिल सकता। लेकिन जानवरों से मिलने वाली वस्तुओं में इसकी मौजूदगी होती है। आप मांस, अंडा, दूध, दही, पनीर, छाछ, खीर कुछ भी ले सकते हैं। लेकिन बी-12 लेना तो पड़ेगा ही। वरना बड़ी समस्या हो सकती है। बी-12 बी-कॉम्प्लेक्स परिवार के आठ सदस्यों में से एक है। हमारा और कई जानवरों का शरीर इसे यकृत (लिवर) में स्टोर रखता है। यही कारण है कि पशुओं के कलेजे यह विटमिन पाने के अच्छे स्रोत में से एक माने जाते हैं। लेकिन बहुत से लोग यह नहीं खा सकते। उन्हें बी-12 की गोलियां या कैप्सूल लेने होंगे। इस बाबत वे अपने डॉक्टर से बात कर सकते हैं।