नई दिल्ली । आधुनिक युग में मनुष्य को विज्ञान ने जो सहूलियतें प्रदान की हैं, वे किसी वरदान से कम नहीं हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। लोगों को अनेक अभिशापों का भी सामना करना पड़ रहा है। तेजी से बढ रहा वायु प्रदूषण औद्योगिक विकास से जन्मा एक ऐसा ही अभिशाप है। वर्तमान में शहरों में रहना सेहत के लिए नुकसानदेह हो गया है। अमेरिका से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित हेल्थ जर्नल ‘लैंसेट’ में बीते जून माह के एक अध्ययन में सामने आया है कि मधुमेह के मरीजों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि के लिए पर्यावरण में पीएम 2.5 कणों में वृद्धि होना है। यह परेशान करने वाली जानकारी है कि दुनिया के 25 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली, बीजिंग से दोगुना और लंदन की तुलना में दस गुना अधिक प्रदूषित है। यह बढ़ता हुआ वायु प्रदूषण कई बीमारियों जैसे दमा, ब्रॉन्काइटिस और निमोनिया जैसे फेफड़ों की समस्याओं में वृद्धि करने का कारण बन रहा है। कई अन्य गंभीर बीमारियां जैसे हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर और गुर्दे आदि की समस्याएं भी कुछ हद तक वायु प्रदूषण से संबंधित हैं। 
नए अध्ययन के अनुसार मधुमेह (डायबिटीज) की बीमारी का एक कारण वायु प्रदूषण से भी जुड़ा है। भारत में पिछले चार दशकों में डायबिटीज के मामलों में लगभग 10 गुना वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में इस मर्ज से कहीं ज्यादा लोग ग्रस्त हुए हैं। यह सही है कि डायबिटीज के मामलों के बढ़ने का कारण खानपान से संबंधित है। जैसे रिफाइंड, अनाज या मैदे से बनी चीजों और चिकनाई युक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में सेवन करना और व्यायाम न करना। अस्वास्थ्यकर जीवनशैली में परिवर्तन न करने से व्यक्ति मोटापे से ग्रस्त हो जाता है। मोटापे से ग्रस्त होना डायबिटीज जैसे मर्ज के अलावा हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग या लिवर की समस्याओं को भी कालांतर में उत्पन्न कर सकता है, लेकिन जिस रफ्तार से ये बीमारियां बढ़ रही हैं, वे चिंता का विषय बन गई हैं। जीवनशैली के अतिरिक्त कुछ अन्य कारण भी हैं, जो डायबिटीज के मामलों में वृद्धि के लिए और विशेष रूप से ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में इस रोग की प्रसार दर में अंतर के लिए उत्तरदायी हैं।