भोपाल । श्री 1008 शीतलनाथ दिगम्बर जैन मंदिर मंदाकिनी में राष्ट्र संत आचार्य विशुद्ध सागर के ससंघ श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याण प्रतिष्ठा विश्व शांति महायज्ञ एवं गजरथ महोत्सव का 8 दिवसीय महानुष्ठान होने जा रहा है जिसमें अनेक धार्मिक अनुष्ठानों और क्रियाओं के माध्यमों से पाषाण को भगवान बनाया जायेगा। आयोजन को लेकर राजधानी के जैन समाज में अभूतपूर्वक उत्साह है। अनेक शहरों से श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया है। आयोजन स्थल ने तीर्थ का स्वरूप ले लिया है। आचार्यश्री विशुद्ध सागर महाराज के दर्शनों हेतु सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। संपूर्ण क्षेत्र में हे स्वामी नमोस्तु, हे स्वामी नमोस्तु के स्वर गूंजते रहते हैं। मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉ. मुकेश जैन ने बताया कि आज प्रात: आचार्य संघ के सानिध्य में मूलनायक भगवान शीतलनाथ का अभिषेक और विशेष पूजा अर्चना की गई। तत्पश्चात धर्मसभा का शुभारंभ आचार्य विद्या सागर महाराज और आचार्य विराट सागर महाराज का चित्र अनावरण एवं चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन के साथ हुआ। 
आचार्यश्री को राजधानी की विभिन्न मंदिर समितियों, विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों एवं भीलवाड़ा (राजस्थान), औरंगाबाद (महाराष्ट्र), हैदराबाद (आंध्र प्रदेश), जबलपुर, इंदौर, उज्जैन सहित प्रदेश के प्रमुख शहरों से आये धर्मावलंबियों ने श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद लिया। आचार्यश्री का पाद प्राच्छालन प्रदीप झांझरी (उज्जैन) तथा आचार्यश्री के करकमलों में शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य एडवोकेट प्रमोद चौधरी परिवार को प्राप्त हुआ।  
आचार्यश्री विशुद्ध सागर महाराज ने आशीष वचन में कहा कि धर्म खोजने से नहीं मिलता धर्म तो सभी के अंदर होता है, धर्म वहां है जहां साम्यभाव है, धर्म वहां है जहां करुणा दृष्टि है और धर्म वहां है जहां प्राणी मात्र के प्रति ही नहीं अपितु सभी वस्तुओं के प्रति एकत्वदृष्टि है। यह आप सभी का भूतकाल का पुण्य है और वर्तमान का पुरुषार्थ जो पाषाण से भगवान बनने के महानुष्ठान में शामिल है। मंदिर के अंदर दर्शन करने सभी जाते हैं पर मंदिर में जाकर निज मंदिर के अंदर प्रवेश कर जाओ अर्थात्् निज की अनुभूति प्राप्त हो जाये तो जिनालय जाना सार्थक है। आचार्यश्री ने कहा धर्म के साथ धर्म करो जो धर्म बिना धर्म करता है वह नियम से ईर्ष्या की ओर स्वयं को ले जायेगा। महाराज जी ने आगे कहा कि जैसे तेल की कढ़ाई में गिरे जीव को कोई भी बचा सकता है पर ईर्ष्यारूपी तेल से जलने से आपकी स्वयं की ज्ञान और प्रज्ञा ही बचा सकती है। बिना हाथ जोड़े प्रभु और गुरु के प्रति विनय नहीं दिखती वैसे ही बिना भाव के हाथ जुड़ते नहीं है जब अंदर से भीतर के भावों से विनय होगी तो बाहर का नमस्कार वंदना एवं श्रद्धा से भरी होगी। विनय के परिणाम वहीं होंगे जिसका अहंकार छूट चुका होगा और विशुद्धि वहीं जन्म लेगी जहां से ईष्या पलायन कर चुकी होगी। यह मत देखों हम क्या हैं यह देखो हम और भी कुछ हो सकते हैं। क्योंकि सबके दिन एक जैसे नहीं होते और सब दिन एक से नहीं होते। 
सोमवार को गर्भ कल्याणक की (पूर्वाद्धरूप) होंगी क्रियाएं 
 आयोजन समिति के मीडिया प्रभारी अंशुल जैन ने बताया कि आज 13 मई सोमवार को पंचकल्याण की पावनबेला का प्रथम कल्याणक, गर्भ कल्याणक (पूर्वाद्ध रूप) की क्रियाएं होंगी, प्रात: 6 बजे जिन अभिषेक, नित्य नियम पूजन और आचार्यश्री की दिव्य देशना दोपहर 1 बजे, याग मंडल विधान और रात्रि 8 बजे गर्भ कल्याणक के पूर्व रूप सौधर धर्म इन्द्र के दरबार में तत्व चर्चा, कुबेर द्वारा अयोध्या की रचना, रत्न वृष्टि, अष्ट कुमारियों द्वारा माता की सेवा तथा गर्भ कल्याणक की आंतरिक क्रियाओं का मंचन होगा।