रमजान माह का चांद दिखने के साथ ही तराबी पढ़ने और रोजे रखने की शुरुआत हो जाती है। वैसे तो रमजान भी एक माह का ही नाम है, लेकिन इसे रोजे और नमाज के साथ ही कुर्रान की तिलाबत खास बना देते हैं। महीने भर रोजे रखकर खुदा की इबादत करना और अपने आपको उसके सामने एक सच्चा बंदा होने का सबूत पेश करना अपने-आप में इंसान के लिए खास हो जाता है। इसलिए रमजान के महीने में कुछ ऐसी बातें होती हैं, जिनका ध्यान रखना भी जरुरी होता है। इसमें सबसे पहले चांद देखकर रमजान के शुरु होने की घोषणा के साथ ही तराबी पढ़ना और अगली सुबह वक्त पर उठना और सेहरी करते हुए रोजे की नियत करना जरुरी हो जाता है। रमजान का रोजा रखते हुए समय का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि जिस तरह से सुबह सादिक से पहले सेहरी करने का हुक्म है वैसे ही शाम के वक्त सूरज गुरुब होने के समय इफ्तार कर रोजा खोलने का भी हुक्म है। इसलिए समय का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। रमजान के दौरान यहां-वहां भटकने और बाजार के चक्कर लगाने से बेहतर है कि रोजे की हालत में ज्यादा से ज्यादा समय इबादत में गुजारें और मन को बहलाने के लिए टीवी, फिल्म या अन्य मनोरंजन के साधनों का उपयोग न करें। इस समय चूंकि गर्मी ज्यादा है, अत: सेहरी में और इफ्तार के समय जरुरत के लिहाज से पानी ज्यादा पीयें, ताकि जिस्म में पानी की कमी न होने पाए। खजूर के साथ हल्का इफ्तार करें और उसके बाद पानी, सलाद, फल, जूस और सूप भी ले सकते हैं, इससे भी पानी की कमी पूरी होती है। इसी तरह सेहरी में ध्यान रखें कि ज्यादा तली हुई चीजों का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे प्यास लगना और एसीडिटी की शिकायत हो सकती है। इस गरम मौसम में सेहरी करते हुए दूध, ब्रेड, रोटी या फल आदि सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। इसके साथ ही खुदा को राजी करने के लिए रमजान में ज्यादा से ज्यादा इबादत करें और झूठ बोलने, गीबत करने, यहां-वहां की फालतू बातें करने से बचें। नेक काम करें जिससे सवाब में बढ़ोत्तरी हो सके और ऐसा करने से आपका मन भी हल्का होता है। इसलिए कुरान की तिलावत करें, नमाज पढ़ें, जकात दें, सदका निकालें और खुदा के जिक्र में लगे रहें। इसके साथ ही जितना संभव हो सके रोजेदारों को इफ्तार कराएं इससे भी बहुत सवाब मिलता है। कुल मिलाकर यह न भूलें कि रमजान रहमतों और बरकतों वाला महीना है, जिसमें रोजदार चाहे तो नेक काम करते हुए अपने रब को राजी कर जन्नत की दुआ कर सकता है।    
रमजान में खुदा अपने नेक बंदों पर खास करम फरमाता है। उसकी हर जायज दुआ को कुबुल करता है। इसी के साथ रमजान में जन्‍नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और जहन्‍नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि रमजान के रोजे रखते हुए महज भूख-प्यास को सेहन करना ही काफी नहीं होता बल्कि पूरी कसरत के साथ खुदा को राजी करने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए रोजा आंखों का, जुबान का और अपने जेहन का भी होना चाहिए। यानी खाने-पीने से जिस तरह से परहेज किया जाता है उसी तरह से गंदी बातों को सुनना, बोलना और उसके बारे में सोचना भी गुनाह है। यह मानकर रोजा रखा जाना चाहिए, तभी खुदा अपने नेक बंदे से खुश होता और उसकी दुआओं को कुबूल करता है। इसलिए कहा जाता है कि रमजान में नमाज पढ़ने के साथ ही कुरान पाक की तिलावत भी करना जरुरी होता है। इसका सवाब भी बहुत ज्यादा है। इस प्रकार रमजान का हर लम्हा इबादत करने और सवाब कमाने के लिए होता है।