रायपुर। राजधानी के अलग-अलग इलाकों में श्रीराम-जानकी के कई मंदिर प्रतिष्ठापित हैं, जहां रामनवमी के मौके पर दर्शन करने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ता है। इनमें से कुछ ऐसे मंदिर हैं, जिनकी ऐतिहासिकता प्रमाणित है। वे मंदिर लगभग 500 साल पुराने हैं।

दूध पर जिंदा रहने वाले महंत के नाम पर पड़ा दूधाधारी मठ

महाराजबंध तालाब के सामने दूधाधारी मठ में भगवान श्रीराम-जानकी, भगवान बालाजी और हनुमानजी विराजे हैं। कहा जाता है कि यह मठ 500 साल पुराना है। मठ के महंत बलभद्र दास हनुमानजी के परम भक्त थे। वे गाय के दूध से हनुमानजी का अभिषेक करके उसी दूध का सेवन करते थे। दूध के अलावा कुछ भी नहीं खाते थे।

कालांतर में उन्हीं के नाम पर मठ का नाम दूधाधारी मठ रखा गया। मुख्य द्वार पर स्थापित स्मृति चिन्ह पर संवत 1610 और सन्‌ 1554 अंकित है। मुगल काल में स्थापित मठ का पुनर्निर्माण अंग्रेजी शासनकाल में हुआ। श्रीराम-जानकी मंदिर का निर्माण पुरानी बस्ती के दाऊ परिवार ने करवाया था। राजस्थान से मूर्ति मंगवाई थी।

यहीं स्थापित भगवान बालाजी की मूर्ति का निर्माण नागपुर के भोसले वंश के राजा ने करवाया। मंदिर के करीब ही रावणभाठा मैदान में होने वाला रावण दहन का कार्यक्रम दूधाधारी मठ के नेतृत्व में ही होता है।
जैतूसाव मठ में लगता है कई क्विंटल मालपुआ का भोग

पुरानी बस्ती, टुरी हटरी से कुछ ही दूर स्थित जैतूसाव मठ लगभग 200 साल पुराना है। यहां लक्ष्मीनारायण के रूप में श्रीराम-जानकी विराजे हैं। रामनवमी के मौके पर यहां कई क्विंटल मालपुआ का भोग लगता है। मालपुआ का प्रसाद ग्रहण करने कोने-कोने से भक्त मंदिर आते हैं। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण कोमा बाई साव ने 200 साल पहले करवाया था। इसी मंदिर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंग्रेजों के खिलाफ योजनाएं बनाने और देश को आजादी दिलाने एकत्रित होते थे।
1000 विद्वान मठ से निकले

जैतूसाव मठ में रामचंद्र संस्कृत विद्यालय में संस्कृत की शिक्षा दी जाती है। बताया जाता है कि पिछले 100 सालों में 1000 से अधिक विद्यार्थी वेदाचार्य और 100 से ज्यादा श्रीराम कथा, श्रीमद्भागवत कथा के मर्मज्ञ बनकर निकल चुके हैं। देशभर में कथाएं करके उनके कई शिष्य बन चुके हैं।