या देवी सर्वभूतेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम आदि शक्ति माता महामाया भगवती दुर्गा का दूसरा स्वरूप है ब्रह्मचारिणी का।
देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप उनके नामनुसार ही तपस्विनी जैसा है। माता के इस रूप एवं उनकी भक्ति के मार्ग पर जब हम आगे बढ़ रहे हैं तो आइये मईया की महिमा का गुणगान करें।
देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय है। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को प्रदिप्त कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डलु है। यह देवी साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप है अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं। इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा माता ब्रह्मचारिणी हिमालय और मैना की पुत्री हैं। इन्होंने देवर्षि नारद जी के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें मनोवांछित वरदान दिया जिसके फलस्वरूप यह देवी भगवान भोले नाथ की वामिनी अर्थात पत्नी बनी। जो व्यक्ति अध्यात्म और आत्मिक आनन्द की कामना रखते हैं उन्हें इस देवी की पूजा से सहज से यह सब प्राप्त होता है। देवी का दूसरा स्वरूप योग साधक को साधना के केन्द्र के उस सूक्ष्मतम अंश से साक्षात्कार करा देता है जिसके पश्चात व्यक्ति की ऐन्द्रियां अपने नियंत्रण में रहती और साधक मोक्ष का भागी बनता है। इस देवी की प्रतिमा की पंचोपचार सहित पूजा करके जो साधक स्वाधिष्ठान च में मन को स्थापित करता है उसकी साधना विफल नहीं जाती है और व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है। दुर्गा पूजा में नवरात्रे के नौ दिनों तक देवी धरती पर रहती हैं अतऱ यह साधना का अत्यंत सुन्दर और उत्तम समय होता है।