जबलपुर । यह वाक्या फिल्मी तो नहीं लेकिन उससे कम भी नहीं था। एक प्रशासनिक अफसर की पत्नी ने अपनी तेज रफ्तार कार अचानक व्यस्ततम मार्ग में रुकवा दी और बैक कराई। उनकी नजर एक स्ट्रीट डॉग पर पड़ी। स्ट्रीट डॉग की नजर भी कार की तरफ गई। तभी कार से आवाज लगाई.. मार्गो। फिर क्या था? पलक झपकते ही स्ट्रीट डॉग, कार के नजदीक आ गई। कार से फिर मार्गो की आवाज आई और फिर जो हुआ, ऐसा अक्सर फिल्मों में देखने मिलता है। स्ट्रीट डॉग ने एक छलांग लगाई और कार के अंदर। वह अपनी बिछुड़ी मालकिन से जाकर लिपट गई।

दरअसल, यह तत्कालीन एसडीएम की मादा जर्मन शेफर्ड थी, जो दो साल पहले गायब हो गई थी। उस समय उसकी उम्र मात्र 4 माह की थी। लाखों की आबादी वाले शहर में दो साल भटकने के बाद फिर से मार्गो अपने मालिक के पास पहुंच गई। मार्गो के मिलते ही शुक्ला परिवार के खुशी से आंसू छलक पड़े।

 

ऐसे हुई गायब

 

 

रांझी एसडीएम के तौर पर पदस्थ रह चुके सुनील शुक्ला (अब आरटीओ छिंदवाड़ा) के कटंगा स्थित सरकारी आवास से चार माह की जर्मन शेफर्ड मार्गो दो साल पूर्व अचानक गायब हो गई थी। कई दिनों तक परिवार वाले जबलपुर की सड़कों पर उसे ढूंढते रहे। पुलिस में एफआईआर भी की गई और अखबारों में गुमशुदा होने के विज्ञापन भी दिए लेकिन मार्गो का कहीं कोई सुराग नहीं मिला।

फुटपाथ पर मिली

 

6 मार्च को दोपहर 3 बजे एसडीएम की पत्नी प्रतिमा शुक्ला अपनी कार से वीकल मोड़ रांझी से होते हुए अपने दफ्तर जा रही थीं। उनकी कार के शीशे खुले हुए थे और सड़क किनारे उनकी नजर जिस स्ट्रीट डॉग पर पड़ी, वह उनकी पालतू डॉग ही थी। मार्गो उसी जंजीर में मिली जो गायब होने वाले दिन उसके गले में थी। शरीर पर खरोंच और जख्म भी थे और बहुत कमजोर हो चुकी थी। उसे तत्काल वेटरनरी अस्पताल ले जाया गया। अब उसका इलाज चल रहा है और वह पूरी तरह स्वस्थ है।

घर पहुंचते ही अपना पट्टा खींच लाई

 

मार्गो को जैसे ही घर में लेकर पहुंचे तो वह सबसे पहले घर के उसी कोने में पहंुची जहां उसका खाने का और अन्य सामान रखा जाता है। उसने अपना पट्टा मुंह में दबाकर बाहर निकाल लिया। बच्चे परीक्षित और व्याख्या की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

विचित्र संयोग रहा

 

सबसे ज्यादा खुशी बच्चों और पत्नी को मिली जब मार्गो वापस आ गई। यह बड़ा विचित्र संयोग रहा कि उसने खुद मेरी पत्नी को पहचान लिया। इतने बड़े शहर में स्ट्रीट डॉग और लोगों से बचकर जिंदा रहना ही बड़ी बात है - सुनील शुक्ला, आरटीओ छिंदवाड़ा, पूर्व एसडीएम जबलपुर

डॉग की याददाश्त अच्छी

 

 

हाथी के बाद किसी जानवर की मेमोरी यदि अच्छी होती है तो वह डॉग ही है। इनमें भी जर्मन शेफर्ड की याददाश्त सबसे ज्यादा अच्छी मानी गई है। इस घटना में तो काफी लंबे समय बाद डॉगी ने मालकिन को पहचाना है। यह अपने आप में बड़ी बात है- डॉ. एबी श्रीवास्तव, पूर्व वेटरनरी एवं वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट