इन्दौर । मनुष्य जीवन कर्म प्रधान हैं। कर्मों में श्रेष्ठता के बिना जीवन सफल नहीं हो सकता। कंस और रावण व्यक्ति नहीं, अब प्रवृत्ति बन गए हैं। आतंकवाद भी कंस और रावण की प्रवृत्तियों का प्रतिबिंब है। भारत की पुण्य धरा पर देश को तोड़ने वाली ताकतें ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती। देवताओं और दानवों के बीच युद्ध की परंपरा अनादिकाल से रही है। आज एक बार फिर दानवीय ताकतें सिर उठा रही हैं। इन्हें कुचलना धर्म का ही हिस्सा है। हम धनवान के बजाय धर्मवान बनें, यही हमारी संस्कृति है और यही हमारा लक्ष्य भी होना चाहिए। धर्म, समाज, संस्कृति और इन सबसे बढ़कर राष्ट्र के लिए मरना भी हमारा जुनून होना चाहिए। 
शिवपुरी से आए भागवत मर्मज्ञ आचार्य डॉ. गिरीश महाराज ने गीता भवन सत्संग सभागृह में बालाजी सेवा संस्थान ट्रस्ट एवं गुड़ावाले परिवार की मेजबानी में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में राम-कृष्ण जन्म प्रसंग के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा शुभारंभ प्रसंग पर बालाजी सेवा संस्थान के प्रबंध न्यासी डॉ. आर.के. गौड़, गीता भवन ट्रस्ट के मंत्री राम ऐरन, सोमनाथ कोहली, महेशचंद्र शास्त्री आदि ने व्यासपीठ एवं भागवतजी का पूजन किया। अतिथियों की अगवानी श्रीमती भगवानदेवी गौड़, डॉ. के.के. गौड़, रामविलास राठी ने की। कथा में भगवान राम एवं कृष्ण के जन्मोत्सव भी धूमधाम से मनाए गए। कथा स्थल को फूलों एवं गुब्बारों से सजाया गया था। ‘नंद में आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की....’ जैसे भजनों पर समूचा सभागृह थिरकता रहा। माखन-मिश्री से भरी मटकी भी फोड़ी गई। संयोजक डॉ. आर.के. गौड़ ने बताया कि भागवत कथा का समापन शनिवार 2 मार्च को दोपहर 3 से 6 बजे तक रूक्मणी मंगल, सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष प्रसंगों के साथ होगा। 
डॉ. गिरीश महाराज ने कहा कि रामायण जीना सिखाती है और भागवत मरने का तरीका। जीते तो सभी हैं लेकिन कुछ सलीके से जीने का मजा अलग ही है। वैसे ही मरना तो सबको है, लेकिन मरते हुए भी हम धर्म, समाज और देष के लिए कुछ कर जाएं तो हमारा नाम बना रहेगा, जैसा हमारी सेना कर रही है। आज हमारी नई पीढ़ी को धर्म और संस्कृति से जोड़ना सबसे महत्वपूर्ण काम है। घर-परिवार बिखर रहे हैं। शास्त्रों में भी कहा है कि जिस घर में नारी का सम्मान नहीं होता, वह घर नरक के समान होता है। नारी को भी मर्यादा में रहने की जरूरत है। मर्यादा ही नारी का सबसे बड़ा आभूषण है। धर्म और संस्कृति में रचा-बसा परिवार ही समाज और देष को नए संस्कार दे सकता है। भगवान कृष्ण का जन्म नहीं, अवतरण हुआ है। कृष्ण भारत भूमि के कण-कण में आज भी रचे-बसे हैं। बिना राम और कृष्ण के भारत भूमि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भगवान ने ही हमें तन, मन और धन दिए हैं। हम धनवान के बजाय धर्मवान बनें, यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। धन तो नष्ट हो सकता है, लेकिन धर्म से जुडे़ संस्कार कभी नष्ट नहीं होते।