इन्दौर । ताजातरीन सूफी कलामों के हसीन गुलदस्ते की महक से ग्रीनपार्क की आबोहवा भी सूफियाना हो उठी थी। लेकिन जैसे ही वतन से मोहब्बत के कलाम पढ़े गए हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारों से माहौल गूंज उठा। अज़ीम नाज़ा ने सरहद के हालात पर शायर फहीम जोगापुरी का शेर सुनाया - वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से, वो और थे जो हार गए आसमान से। कव्वाल ख़ालिद साबरी ने सुनाया - किसी भी क़ौम से हमदर्दियां जताने को, गलत बयान गलत बोलिया नहीं चलती, तुम्हारे मुल्क से बेहतर हमारा भारत है, के नमाज़ियों पे यहां गोलियां नहीं चलती। 
शहीदों को श्रद्धांजलि देने के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। संजरी ग्रुप और आशिकाने ग़रीब नवाज़ की मेज़बानी में आयोजित जश्ने ग़रीब नवाज़ की इस सुरमयी महफ़िल को अपनी दिलकश आवाज से सजाने के लिए मुम्बई से मशहूर सूफी गायक और कव्वाल अज़ीम नाज़ा ने लगातार 4 घंटे तक माहौल को खुशनुमा सुरों में बांधकर अपनी पेशकश से सभी को झूमने पर मजबूर कर दिया। बतौर ख़ास मेहमान सेंट्रल हज कमेटी के मेम्बर हाजी इनायत हुसैन कुरैशी, कांग्रेस के गोलू अग्निहोत्री, सैयद वाहिद अली, मंज़ूर बेग, सादिक़ ख़ान, रफ़ीक़ खान, अकबर भाई, आफताब खान, नासिर छीपा, अमजद चन्दन, शकील कुरैशी इस सूफ़ियाना कव्वाली का लुत्फ उठाने के लिए पहुंचे। कॉलोनी के बच्चे, बुज़ुर्ग और युवाओं ने भी पहुंचकर सूफीयाना महफ़िल में शिरकत की। मेहमानों और फनकारों का इस्तक़बाल सूफी जावेद बाबा, आयोजक पार्षद अनवर दस्तक, इमरान हुसैन कुरैशी, मुस्तक़ीम देहलवी आदि ने किया। अज़ीम नाज़ा ने मंच सम्भालते ही कहा आप सबको प्यार भरा सलाम। उन्होंने ने अल्लाहु अल्लाहु से अपने कव्वाली के सफर का बुलन्द इरादों से आगाज़ कर बता दिया कि आज की रात कुछ ख़ास करेंगे, फिर उन्होंने एक से बढ़कर एक कलाम सुनाकर महफ़िल को ऊँचाइयाँ बख़्शी। अज़ीम नाज़ा ने सरहद के हालात पर शायर फहीम जोगापुरी का शेर सुनाया - वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से, वो और थे जो हार गए आसमान से। वतन से मोहब्बत का पैगाम देते हुए उन्होंने दिल दिया है जां भी देंगे ए वतन तेरे लिए सुनाकर माहौल बना दिया। उन्होंने ये शेर भी सुनाया - खून से अपने तेरी खाक़ (मिट्टी) भिगो जाएंगे, तुझ पर क़ुर्बान तेरे लाडले हो जाएंगे, तेरे बेटे हैं तेरी गोद में भारत माता, हम तिरंगे का कफ़न ओढ़कर सो जाएंगे। अज़ीम नाज़ा ने क़द्रदानों की फरमाइश भी पूरी करते हुए किसी को मायूस नहीं किया। अज़ीम नाज़ा ने उम्मीद के मुताबिक अपनी हर पेशकश को सूफीयाना चाशनी में डूबोकर पेश किया और लोग झूम उठे। उनकी पेशकश में मोला मेरे मोला, मेरे हाजिर अली, तू जाने ना, मन की लगन, आज तक़दीर मेरी संवर जाने दो,तू बड़ा गरीब नवाज़ है, राजा तो मेरा ख़्वाजा है की सूफी पेशकश बेमिसाल थी। और इस दौरान हर पेशकश से वहां बैठे हर खासोआम को आखिरी तक जोड़े रखा। बल्कि अज़ीम नाज़ा की पुरकश आवाज से मुतासिर होकर उनके कदम खुद ब खुद झूमने के लिए भी उठे। इससे पहले स्थानीय कव्वाल ख़ालिद सबरी ने सूफ़ियाना कलाम से सबकी तबीयत मस्त कर दी। उन्होंने नाते पाक - "तू कुजा मन कुजा तू कुजा मन कुजा" पढ़ी और रूहानियत घोल दी। उन्होंने सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है सुनाकर सबको जज़्बाती कर दिया। कव्वाल ख़ालिद साबरी ने सुनाया - किसी भी क़ौम से हमदर्दियां जताने को, गलत बयान गलत बोलिया नहीं चलती, तुम्हारे मुल्क से बेहतर हमारा भारत है, के नमाज़ियों पे यहां गोलियां नहीं चलती। ख़ालिद साबरी ने "मौला अली का साथ दो जहाँ से प्यारा है सुनाया जो पसन्द किया गया। 
कुल मिलाकर इस यादगार महफ़िल में पहुंचे सभी लोग अपने चेहरों पर मुस्कान लेकर अपने-अपने घरों को लौटे।जश्ने ग़रीब नवाज़ में पहुंचे सभी अक़ीदतमन्दों का शुक्रिया अदा करते हुए सूफी जावेद बाबा वारसी ने कहा कि शहर के लोगों की सूफी संगीत के प्रति दिलचस्पी के मुताबिक़ इस नामी फनकार को आमंत्रित किया गया क्योंकि सूफीयाना गायिकी में हर दम रुहानी मस्ती रहती है तथा रूह जो महसूस करती है वही कव्वाली के जरिए बयान भी करती है।उन्होंने बताया इंशाल्लाह हर साल इस तरह की महफ़िल सजाई जाएगी।