मध्य प्रदेश बीजेपी में बुजुर्गों के कथित अपमान का सिलसिला लगातार जारी है. शिवराज सरकार में मंत्री रहे बुजुर्ग नेता रामकृष्ण कुसमरिया कांग्रेस में शामिल हो ही चुके हैं. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर भी दहलीज पर ही खड़े हैं. जाने कब बीजेपी को टा-टा कर दें. और अब तो वरिष्ठ महिला नेत्री जिज्जी यानी कुसुम मेहदेले भी लोकसभा टिकट देने, राज्यसभा सांसद या राज्यपाल बनाए जाने की मांग कर चुकी हैं. सिख समाज से आने वाले पुराने भाजपाई सरताज सिंह पहले ही पार्टी से विदा हो चुके हैं. कुल मिलाकर बीजेपी में से 75 पार के बुजुर्गों के ‘एक्जिट’ का सिलसिला जारी है.

जाहिर है कि बुजुर्ग नेताओं की पार्टी से नाराजगी की कई वजहें होंगी. शायद कुछ जायज कुछ नाजायज. सवाल कई हैं. क्या बीजेपी में वाकई बुजुर्ग नेताओं का अपमान हो रहा है…? इन बुजुर्गों के जाने से पार्टी को कितना नुकसान हो सकता है...? क्या कथित अपमान से व्यथित होकर कांग्रेस का दामन थामने वाले नेता फिर से पुराना सम्मान हासिल कर सकेंगे...? लेकिन इस सवालों पर चर्चा फिलहाल नहीं.

वैसे व्यक्तिगत मान-अपमान, लाभ-हानि को लेकर कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन धामने वालों की सूची भी काफी लंबी है. इस सूची में भागीरथ प्रसाद, राव उदय प्रताप सिंह, संजय पाठक, चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी जैसे दिग्ग्ज शामिल है. हां, ये बात अलग है कि इनमें से कोई भी नेता 75 पार नहीं है. राजनीति में एक शब्द का प्रयोग अकसर किया जाता है. वो शब्द है ‘विचारधारा’. समाजवादी, साम्यवादी, गांधीवादी से लेकर दक्षिणपंथी, वामपंथी, मनुवादी, जातिवादी, फासिस्टवादी और जाने किस-किस प्रकार के विचारों या कुविचारों वाली धाराएं राजनीति में सक्रिय हैं. एक विचारधारा के लोगों का दूसरी विचारधारा वालों पर किया जाने वाला हमला समझा जा सकता है. लेकिन क्या व्यक्तिगत कारणों से पाला बदल लेने के बाद नई विचारधारा भी ‘बस दो मिनिट’ में मैगी की तरह तैयार हो जाती है...? कैसे कल तक बीजेपी में रहकर ‘कश्मीर समस्या’ के लिए पंडित नेहरू को कोसने वालों को कांग्रेस का दामन थामते ही ‘नेहरू का औद्योगिक मॉडल’ याद आने लगता है. या कि बीजेपी को ‘दंगे करने वाले पार्टी’ करार देने वालों को ‘मोदी’ में देश का भविष्य नजर आने लगता है. आज के दौर का सबसे अहम विचार है ‘अपना उल्लू सीधा करने का विचार’. इसी विचार से उपजी विचारधारा बाकी सब पर भारी है. शायद इसीलिए चुनाव से ठीक पहले गांधी की पार्टी के लोग ‘गोडसे के विचार’ से आए लोगों को गले लगा रहे हैं. वहीं कांग्रेस को अपनी ‘मां’ कहने वाले नेता संजय पाठक बीजेपी सरकार में मंत्री बनने का सुख भोग चुके हैं.
बीजेपी में कभी शीर्ष पर रहे ये बुजुर्ग नेता सारी जिंदगी पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर राम मंदिर, धारा 370 और यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों पर वोट मांगते थे, लेकिन अब व्यक्तिगत अपमान के चलते इन्होंने अपनी विचारधारा के पुलिंदे को बैंक में फिक्स डिपॉजिट कर दिया है. भविष्य में जरूरत पड़ी तो शायद ब्याज के साथ इसी विचारधारा को फिर से इस्तेमाल कर लिया जाएगा.
कुल मिलाकर ‘विचारधारा’ जिस चिड़िया का नाम है, उस प्रजाति की चिड़िया हिंदुस्‍तान की राजनीति से विलुप्त हो चुकी है. तो आने वाले चुनाव में वोट तो जिसे चाहें दें, लेकिन किसी पार्टी में ‘विचारधारा’ खोजने की गलती बिलकुल न करें.