नई दिल्ली । टूथपेस्ट की बहुत अधिक मात्रा बच्चे के दांतों को नुकसान पहुंचा सकती है। तीन से छह साल तक के बच्चों के ब्रश पर मटर के दाने जितना ही टूथपेस्ट लगाना चाहिए। यह कहना है अध्ययन कर्ताओं का। अमरीका स्थित सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रीवेंशन के एक अध्ययन के मुताबिक़ "क़रीब चालीस फ़ीसदी अभिभावक अपने बच्चों को तय मात्रा से अधिक टूथपेस्ट देते हैं। जिस उम्र में बच्चों के दांत निकल रहे हों, उस उम्र में बच्चों को कम टूथपेस्ट देना चाहिए क्योंकि अधिक मात्रा में टूथपेस्ट का इस्तेमाल करने से उन्हें डेंटल फ़्लोरोसिस की शिकायत हो सकती है। जानकारी के मुताबिक इसकी बड़ी वजह ये है कि टूथपेस्ट में फ़्लोराइड होता है, जो आमतौर पर दांतों को बैक्टीरिया से सुरक्षित रखता है। लेकिन इसकी अधिक मात्रा दांत की ऊपरी परत को घिस देती है। छोटे बच्चों के लिए टूथपेस्ट का कम इस्तेमाल करने की सलाह इसलिए भी दी जाती है क्योंकि टूथपेस्ट के अलावा पानी भी फ़्लोराइड का एक स्त्रोत है। ऐसे में दांतों पर इससे भी असर पड़ता है।स्टडी के मुताबिक़, फ्लोरिसस का असर सिर्फ़ उन बच्चों के दांतों पर होता है जिनके दांत आ रहे होते हैं। इससे डेंटल हेल्थ पर पूरी तरह तो असर नहीं पड़ता लेकिन अगर फ़्लोराइड की मात्रा को नियंत्रित नहीं किया जाए तो दांत बदरंग हो सकते हैं। इस तत्व की बहुत अधिक मात्रा दांतों की बनावट पर भी असर डाल सकती है। जानकारी के अनुसार, टूथपेस्ट सिर्फ़ दांत साफ़ करने का काम नहीं करता बल्कि यह दांतों को सुरक्षित रखने के लिए भी ज़रूरी है। कोई भी टूथपेस्ट ख़रीदने से पहले उस पर असोसिएशन की मान्यता ज़रूर जांच लें। आमतौर पर टूथपेस्ट में पांच तत्व शामिल होते हैं। कैल्शियम फ़ॉस्फेट्स और सोडियम मेटाफ़ॉस्फ़ेट- ग्लिसरॉल या सॉर्बिटॉल- डिटर्जेंट- फ्लेवर और कलर जेंट- फ़्लोराइड आईडीए के मुताबिक, टूथब्रश का इतिहास 3500-3000 ईसा पूर्व का है। 1600 ईसा पूर्व में चीनियों ने च्यूइंग स्टिक का विकास किया और इसके बाद 15वीं शताब्दी में चीनियों ने सूअर की गर्दन के बालों से ब्रसल्स वाले ब्रश का निर्माण किया। यूरोप में भी ब्रश बनाए गए लेकिन घोड़े के बालों से। इसके बाद धीरे-धीरे टूथब्रश का प्रारूप बदलता गया और आज बाज़ार में कई तरह के विकल्प मौजूद हैं। बहुत से लोगों को ऐसा लगता है कि वो जितना ज़्यादा ब्रश करेंगे उनके दांत उतने ही मज़बूत होंगे लेकिन इसमें थोड़ा विरोधाभास है।