जबलपुर। दिनभर की आपाधापी भरी जिंदगी में अब सुकून से मनोरंजन पर भी ट्राई (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने टांग अड़ा दी है। ट्राई द्वारा पैकेज का नया नियम लागू कर दिए जाने से ना केवल उपभोक्ता बल्कि ऑपरेटर भी भ्रमित हैं। ऊपर से सरकार द्वारा मनोरंजन पर १८ प्रतिशत जीएसटी भी लागू है, लिहाजा उपभोक्ता जितना भी पैकेज चुनेंगे १८ पर्सेंट जीएसटी लगेगा। बहुत सारे लोगों को जानकारी नहीं है कि बगैर चैनलोंं का छोटे पर्दे पर जो कुछ भी मुफ्त में परोसा जाएगा उस पर डेढ़ सौ रुपए अनिवार्य है। उसके बाद प्रति चैनल या चैनलों के पैकेज की प्रस्तावित दरें लागू होंगी। फिलहाल तो उपभोक्ताओं को चैनलोंं का चयन करने में पसीने छूट रहे हैं, क्योंकि महिलाओं उनके चुनिंदा सीरियल वाले चैनल चाहिए तो बुजुर्ग सदस्यों को उनके अपने पसंद के चैनल चाहिए तो वहीं युवा को फिल्मी चैनल और न्यूज़ चैनल के साथ-साथ स्पोर्ट्स् चैनल भी चाहिए। छोटे बच्चों को कार्टून चैनल चाहिए। प्रâी चैनलों का जो प्रचार किया जा रहा है, प्रâी कोई नहीं है सिर्फ न्यूज़ १ प्रति महीने के हिसाब से ले रहे हैंं जबकि उस पर १८ परसेंट जीएसटी भी लागू है। इस तरह से अगर परिवार के सभी सदस्यों के मनपसंद चैनल चयनित किए जाएं तो एक परिवार का बजट मनोरंजन पर ढाई सौ से ३०० प्लस १५० फिक्स चार्ज ४०० से ५०० पहुंचेगा। उस पर भी महीने भर में कई दिन महत्वपूर्ण अवसर पर तकनीकी खामियों का खामियाजा भी उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ेगा। इस व्यवस्था से उपभोक्ताओं में आक्रोश पनप रहा है। पहले ५० से ६० महीने में आसानी से मनोरंजन के चैनल केबल ऑपरेटर से मिल जाया करते थे। टैक्स चोरी रोकने के लिए सरकार ने ट्राई का गठन किया। ट्राई ने संचार क्रांति मेंं तो प्रतिस्पर्धा लाकर मोबाइल धारको और टेलीफोन धारकों को राहत पहुंचाई मगर मनोरंजन के क्षेत्र में आफत खड़ीr कर दी। ट्राई ने पहले सेट टॉप बॉक्स अनिवार्य कर आम जनता कीr कमर तोड़ी। अब एमआरपी (मिनिमम रिटेल प्राइस) के नाम पर उपभोक्ताओं पर प्रहार किया है। पिछली मनमोहन सरकार को सेट टॉप बॉक्स का खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ा था, अब मोदी सरकार को ट्राई की एमआरपी कहीं महंगी ना पड़ जाए। जहां तक खबरिया चैनलों का सवाल है तो यह चैनल लगभग उद्योगपतियों के नियंत्रण और सरकार के निर्देशन पर चल रहे हैं, जबकि मनोरंजन चैनल स्पॉन्सर के रहमों करम पर चल रही है। टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में जहां खबरों को सनसनीखेज बनाकर बेचा जा रहा है। वहीं मनोरंजन के नाम पर कुछ भी कहानियां अश्लीलता के साथ परोसी जा रही हैं। लिहाजा इन चैनलों का आदमी के जहन में गहरा प्रभाव पड़ा है। एक तरह से यह कहा जाए कि टीवी चैनल ने ड्रग एडिक्ट की तरह उपभोक्ताओं को अपना शिकार बना रखा है। अब बढ़े हुए दाम या किसी तरह की लगाम से उपभोक्ता तिलमिलाएगा। लोकसभा आम चुनाव के वक्त मनोरंजन पर एमआरपी और जीएसटी सत्तारूढ़ पार्टी को महंगी ना पड़ जाए।