कई लोगों पर शनि की बुरी दिशा होती है। शनि की बुरी दृष्टि से हर किसी को भय लगता है।हालांकि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनिदेव को मनाने के ऐसे कई उपाय हैं जिनसे शनि की शांति होती है। शनि को मनाने के लिए भी शनि प्रदोष व्रत भी बहुत फलदायी है। वैसे तो प्रदोष का व्रत शंकर जी को प्रसन्न करने के लिए रखा जाता है। पुराणों के अनुसार एकादशी पर विष्णु भगवान तो तो प्रदोष को शिव की आराधना की जाती है। लेकिन शनिवार को पड़ने वाले प्रदोष पर महादेव के साथ-साथ शनिदेव की पूजा भी होती है। इसलिए इस व्रत को शनि प्रदोष कहा जाता है।
कहते हैं जो भी इस दिन पूरी श्रद्धा से शनि की उपासना करता है। उनके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। शनि प्रदोष करने से शिव शंभू और शनिदेव दोनों की कृपा बरसती है। शनि प्रदोष व्रत करने से संतान होने में आ रही बाधा भी दूर होती है। कल 19 जनवरी को शनिवार को साल का पहला शनि प्रदोष व्रत और कल साल का दूसरा प्रदोष है। पढ़िए शनि प्रदोष व्रत से होने वाले प्रभाव के बारे में।
शनि प्रदोष क्यों हैं खास

शनि प्रदोष पर प्रात:काल में भगवान शिवशंकर की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, तत्पश्चात शनिदेव का पूजन करना चाहिए। इस व्रत से शनि का प्रकोप, शनि की साढ़ेसाती या ढैया का प्रभाव कम हो जाता है। शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष संपूर्ण धन-धान्य, समस्त दुखों से छुटकारा देने वाला होता है। इस दिन दशरथकृत शनि स्त्रोत का पाठ करने जीवन में शनि से होने वाले दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। जो भी व्यक्ति व्रत करे उसको यह पाठ कम से कम 11 बार अवश्य करना चाहिए।

इसके अलावा शनि चालीसा, शनैश्चरस्तवराज:, शिव चालीसा का पाठ तथा आरती भी करनी चाहिए। प्रदोष रखने से आपका चंद्र ठीक होता है। अर्थात् शरीर के चंद्र तत्व में सुधार होता है। माना जाता है कि चंद्र के सुधार होने से शुक्र भी सुधरता है और शुक्र से सुधरने से बुध भी सुधर जाता है। मानसिक अशांति दूर होती है। संध्या का वह समय जब सूर्य अस्त हो रहा होता है एवं रात्रि का आगमन हो रहा होता है उस समय को ‘प्रदोष काल’ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है की प्रदोष काल में शिव जी साक्षात् शिवलिंग पर अवतरित होते हैं और इसीलिए इस समय शिव का स्मरण करके उनका पूजन किया जाए तो उत्तम फल मिलता है।
शनि प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक सेठ रहता था। सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहां से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को खूब दान-दक्षिणा देता था, दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफी दुखी थे। दुःख का कारण था उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों चितिंत रहते थे। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सौंप यात्रा पर निकल पड़े।

अभी वे नगर के बाहर निकले ही थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों साधना करते हुए साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी साधना समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की साधना चलती रही। फिर भी दोनों दंपत्ति धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत् बैठे रहे।

अंततः अगले दिन प्रातः साधु का ध्यान टूटा। वह सेठ पति-पत्‍नी को देख मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूं वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं।’ साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान का वन्दना जाप करने को कहा। तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया । शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया । दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे।
शनि प्रदोष की विधि
शनि प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर भगवान शंकर, पार्वती और नंदी जी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर बेल पत्र, गंध, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग व इलायची अर्पित करनी चाहिए। पूरे दिन मन ही मन ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करना चाहिए। निराहार इस व्रत का पालन किया जाता है। शनि प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है। व्रती को सायंकाल में दोबारा स्नान करके स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिए।

यदि व्रती चाहे तो  शिव पूजा साम्रगी लेकर मंदिर जा कर भी पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। ‘ऊँ नम: शिवाय’ कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें। ध्यान के बाद, शनि प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा सुनाएं। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार ‘ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा’ मंत्र से आहूति देनी चाहिए। उसके बाद शिव जी की आरती करनी चाहिए। सभी को प्रसाद बांट कर बाद भोजन करना चाहिए । भोजन में केवल मीठा भोजन ही करना चाहिए।
कैसे मिलता है लाभ?
अगर किसी भी जातक को भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करना हो तो उसे प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए। इस व्रत को करने से शिव प्रसन्न होते हैं तथा व्रती को सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति करवाने के साथ-साथ पुत्र प्राप्ति का वर भी देते हैं। प्रदोष काल में आरती एवं पूजा की जाती है। शनि प्रदोष से पुत्र की प्राप्ति होती है। संतान प्राप्ति और नौकरी में पदोन्नति के लिए इस व्रत को किया जाता है। शनि प्रदोष के व्रत को पूर्ण करने से अतिशीघ्र कार्यसिद्धि होकर अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। सर्वकार्य सिद्धि हेतु शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई भी 11 अथवा एक वर्ष के समस्त त्रयोदशी के व्रत करता है तो उसकी समस्त मनोकामनाएं अवश्य और शीघ्रता से पूर्ण होती है।