कुंभ मेला एक ऐसा भव्य आयोजन है, जिसमें शामिल होने के लिए दुनिया के कोने-कोने से पहुंचते हैं। मकर संक्रांति से  संगम नगरी प्रयागराज में आस्था का ऐसा ही जमघट लगेगा, जिसे देखने के लिए भारत के अलवा दुनिया भर से धर्म प्रेमी पहुंचेंगे। रोशनी से नहाई हुई पंडालों की नगरी और घंटा-घड़ियालों के साथ गूंजते वैदिक मंत्र और धूप-दीप की सुगंध। जी हां कुछ ऐसा ही सुखद अहसास कुंभ नगरी में पहुंचने पर आपको मिलेगा। आस्था के इस महामेले में आपको कहीं साधु भव्य पंडाल में तो कहीं खुले आसमान में धूनी जमाए साधना में लीन मिल जाएगा। दुनिया के सबसे बड़े कुंभ मेले जैसा धार्मिक-आध्यामिक अनुभव शायद ही कहीं मिले।
कुंभ मेले की सबसे खास बात यह होती है कि यहां बगैर किसी निमंत्रण के लाखों करोड़ों लोग पहुंचते हैं। अहम बात यह कि श्रद्धा की डुबकी लगाने के लिए दूर-दराज से आने वाले इन तीर्थयात्रियों को न तो सरकारी सुविधा की कोई चाह होती है और न ही उसके न होने की कोई शिकायत। दूर-दराज से आने वाला श्रद्धालु अपनी गठरी बांधे संगमतट पहुंचता है और आस्था की डुबकी लगाकर वापस लौट जाता है।
पावन तीर्थ में मनोरथ पूर्ण करने की चाह लिए पहुंचने वाले श्रद्धालुओं में भले ही लोगों की बोलियां, पहनावा और खान-पान अलग-अलग हो लेकिन उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ एक पुण्य की डुबकी होती है, मान्यता है कि जिसके लगाते ही पूर्व और इस जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।
गंगा, यमुना और सरस्वती के पावन संगम तट पर हजारों-लाखों टेंटों के बीच लहराती धर्म ध्वजा के बीच जब आप भक्ति के गोते लगाते हैं, तो आपको एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है। कुंभ का यही आकर्षण विदेशियों को सात समंदर पार से इस पावन नगरी में खींच लाता है।
विश्व के सबसे बड़े धार्मिक मेले कुंभ का आयोजन देश के 4 प्रमुख शहरों हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में किया जाता है। इन शहरों में प्रत्येक 12 सालों में विशेष ज्योतिषीय योग बनने पर कुंभ मेला लगता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवासुर संग्राम के दौरान इन्हीं 4 स्थानों पर अमृत की बूँदे गिरी थीं।
छह साल में होने वाले कुंभ और बारह साल में होने वाले महाकुंभ का प्रमुख आकर्षण साधु-संतों के 13 अखाड़े होते हैं। ये साधु-संत कुंभ के प्रमुख तिथियों के दिन पूरी शानों शौकत के साथ शाही स्नान करने निकलते हैं। शाही स्नान के लिए प्रशासन अखाड़ों से संगम तक संतों के लिए एक विशेष राजपथ बनाता है, जिस पर सिर्फ और सिर्फ अखाड़े चलते हैं।
अखाड़ों की शाहीअंदाज में निकलती पेशवाई को देखकर लोग दांतों तले अंगुलिया दबाने को मजबूर हो जाते हैं। सोने-चांदी के सिंहासनों पर विराजमान साधु-संत और उनके आगे चलते अलमस्त नागा साधुओं द्वारा किए जाने शस्त्र और अस्त्र का प्रदर्शन देशी-विदेशी दोनों को आकर्षित करता है।
भारतीय संस्कृति के महापर्व कुंभ में अखाड़ों से जुड़े साधु-संतों के शाही स्नान का विशेष महत्व है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के मुताबिक 2019 के कुंभ पर्व पर इन तिथियों पर होंगे शाही स्नान —
पहला शाही स्नान — मकर संक्रांति                 
दूसरा शाही स्नान — मौनी अमावस्या (सोमवती) 
तीसरा शाही स्नान — बसंत पंचमी                    
मेले में विभिन्न प्रकार की साधना और वेषभूषा वाले बाबा लोगों की आकर्षण का केंद्र होते हैं। मसलन किसी की जटाएं दस से बारह फिट लंबी हो सकती है तो कोई अपनी जीभ, नाक, कान आदि छिदवाए आपको दिखाई देगा। इसी तरह कोई   रूद्राक्ष की माला से खुद को ढंके हुए आशीर्वाद की मुद्रा में खड़ा नजर आ जायेगा।