नई दिल्ली। अयोध्या में राममंदिर निर्माण की मांग करने वाले सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं। फिलहाल सरकार उधेड़बुन में है कि क्या किया जाए जो कानून सम्मत भी हो और जनभावना के अनुकूल भी। कुछ ऐसा ही दबाव 1993 में बना था जब सरकार ने अयोध्या विवाद का हल निकालने के लिए राष्ट्रपति के जरिये रेफरेंस भेज कर सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या विवादित ढांचे से पहले उस जगह कोई हिन्दू मंदिर था। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने सवाल को निरर्थक और अनावश्यक बताते हुए बिना जवाब दिये बगैर रेफरेंस वापस कर दिया था।पांच जजों की पीठ में से दो जजों ने कहा था कि इस सवाल का जवाब तभी दिया जा सकता है जब पुरातत्व और इतिहासकारों के विशिष्ट साक्ष्य हों और उन्हें जिरह के दौरान परखा जाए। उस समय तो बात यहीं खत्म हो गई थी लेकिन आज अयोध्या में विवादित स्थल पर पहले कोई हिन्दू मंदिर था कि नहीं इस बारे मे भारत पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट उपलब्ध है जो कि हाईकोर्ट के फैसले का हिस्सा भी है। सवाल उठता है कि क्या सरकार अब उस रिपोर्ट या हाईकोर्ट के फैसले में रिपोर्ट के बारे में दिये गए निष्कर्षो के आधार पर फिर कोई कदम उठाएगी।
सरकार को भी जब किसी फंसे हुए कानूनी सवाल का जवाब पाना होता है तो वह राष्ट्रपति के जरिये रेफरेंस भेज कर सुप्रीम कोर्ट की राय लेती है। 1993 में तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या विवाद पर राय मांगी थी। सरकार ने राष्ट्रपति को भेजे गए इस रिफरेंस में कहा था कि सरकार अयोध्या मुद्दा समझौते के जरिये हल करना चाहती है। कोर्ट से इस मुद्दे पर जवाब आने के बाद सरकार उसी के आधार पर आगे निर्णय लेगी।

इस रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट ने मुद्दे को लेकर सरकार से और रुख स्पष्ट करने को कहा था जिसके जवाब में तत्कालीन सालिसिटर जनरल ने 14 सिंतबर 1994 को लिखित जवाब दाखिल कर कोर्ट में अयोध्या मसले पर सरकार का नजरिया रखा था। जिसमें सरकार की ओर से कहा गया था कि 'सरकार धर्मनिरपेक्ष और सभी धर्मावलंबियों के साथ समान व्यवहार की नीति पर कायम है। अयोध्या में जमीन अधिग्रहण कानून 1993 और राष्ट्रपति की ओर सुप्रीम कोर्ट को भेजा गया रेफरेंस भारत के लोगों में भाईचारा और पब्लिक आर्डर बनाए रखने के लिए है।'

इतना ही नहीं सरकार ने कहा था कि 'सरकार राम मंदिर और मस्जिद बनाने के लिए कृत संकल्प है लेकिन वो कहा बनेंगे ये सिर्फ रिफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट की राय आने के बाद तय होगा। सरकार ने कहा था कि वह इस मुद्दे पर कोर्ट की राय को फैसले की तरह अंतिम और बाध्यकारी मानेगी। सरकार ने तो यह भी कहा था- अगर कोर्ट मानता है कि वहां पहले हिंदू मंदिर था तो सरकार हिंदू भावना का ख्याल रखते हुए आगे बढ़ेगी।

ये बात उस समय वहीं इसलिए खत्म हो गई थी क्योंकि कोर्ट ने जवाब दिये बगैर रिफरेंस वापस कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने अयोध्या भूमि अधिग्रहण कानून को कुछ शर्तो के साथ सही ठहराया था। लेकिन उसके बाद वर्ष 2002 में अयोध्या में विवाद की सुनवाई कर रहे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सच्चाई का पता लगाने के लिए एएसआइ को वहां की खुदाई करने का निर्देश दिया। एएसआइ को निर्देश देने वाले न्यायाधीश सुधीर नारायण अग्रवाल जो कि अब सेवानिवृत हो चुके हैं, कहते हैं कि उन्होंने आदेश दिया था। एएसआई की खुदाई में पारदर्शिता और दोनों समुदाय के मौजूदगी का पूरा ध्यान रखा गया था। वे बताते हैं कि खुदाई में लगे एएसआई के कर्मचारियों और मजदूरों में दो तिहाई हिन्दू और एक तिहाई मुसलमान थे।
2003 में एएसआइ ने रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी थी जिसके मुताबिक खुदाई में 54 खंबे व पहले वहां मंदिर होने के अन्य अवशेष होने की की बात कही गई थी। हालांकि फैसला देते समय तक वे सेवानिवृत हो गए थे और फैसला दूसरे न्यायाधीशों ने दिया था। लेकिन हाईकोर्ट के तीन न्यायाधीशों में से दो न्यायाधीशों ने अपने फैसले में एएसआइ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए वहां पहले मंदिर के अवशेष होने की बात कही है।