नवरात्रों में देवी दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। हिंदू धर्म के अनुसार नवरात्र एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, आदिशक्ति के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस पर्व से जुड़ी कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था, इस कथा के बारे में तो सब जानते हीं होंगे। परंतु आज इस पर्व से जुड़ी जिस कथा के बारे में हम आपको बताने जा रहें है, उसके बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे। तो आइए जानते हैं इस कथा के बार में-

पौराणिक कथाओं के मुताबिक रावण के साथ युद्ध से पहले ब्रह्मा जी ने श्रीराम के वध करने से पहले चंडी देवी का पूजन करने को कहा। जिसके बाद चंडी पूजन और हवन के लिए दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता और विजय पाने के लिए चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुंचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासभंव पूर्ण होने दिया जाए। रावण ने अपनी मायावी शक्ति से श्रीराम के हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल गायब कर दिया जिससे श्रीराम का संकल्प टूटता नज़र आने लगा।

सबको इस बात का भय होने लगा कि देवी मां रुष्ट न हो जाएं। इतनी जल्दी दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था करनी असंभव थी लेकिन तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलनयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति के लिए एक नेत्र यानि अपनी आंख अर्पित कर दी जाए। ये सोचते हुए प्रभु राम जैसे ही धनुष से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए तभी देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं आप से प्रसन्न हूं और आपको विजय श्री का आशीर्वाद देती हूं। वहीं रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर कर हनुमान जी सेवा में जुट गए। निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमान जी से वर मांगने को कहा। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए।

ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया। मंत्र में जयादेवी... भूर्तिहरिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। भूर्तिहरिणी यानि कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और 'करिणी' का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमान जी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क' करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।