नई दिल्ली,  फिल्म का नाम : पटाखा

डायरेक्टर: विशाल भारद्वाज

स्टार कास्ट: सुनील ग्रोवर,सान्या मल्होत्रा , राधिका मदान,विजय राज,अभिषेक दुहान, नमित दास

अवधि: 2 घंटा 16 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग:  3.5 स्टार

विशाल भारद्वाज ऐसे निर्माता निर्देशक हैं, जो अलग अंदाज में कहानियां सुनाने के लिए मशहूर हैं. ओमकारा, मक़बूल, कमीने, हैदर या रंगून, अकसर उनकी फिल्में शेक्सपीयर की कहानियों से प्रेरित होती हैं. लेकिन इस बार विशाल ने मशहूर लेखक चरण सिंह पथिक की 6 पेज की शार्ट स्टोरी 'दो बहनें' के ऊपर यह फिल्म बनायी है, जिसे पटाखा नाम दिया गया है. कैसा है इस बार विशाल भारद्वाज का फ्लेवर, पढ़‍िए फिल्म की समीक्षा.

कहानी : फिल्म की कहानी  राजस्थान के एक गांव की है, जहां शशि भूषण (विजय राज) अपनी दो बेटियां बड़की (राधिका मदान) और छुटकी (सान्या मल्होत्रा) के साथ रहता है. दोनों हमेशा आपस में लड़ती रहती हैं. गाली-गलौज के बीच कभी मिट्टी, तो कभी गोबर से युद्ध लड़ती हैं. अक्सर इन दोनों के बीच की लड़ाई का कारण डिप्पर (सुनील ग्रोवर) ही होता है, जो दोनों का एक दूसरे के खिलाफ कान भरता रहता है. कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब बड़की अपने बॉयफ्रेंड जगन (नमित दास) और छुटकी अपने बॉयफ्रेंड विष्णु (अभिषेक दुहान) के साथ भाग जाती हैं, लेकिन दोनों एक ही घर में शादी के बाद पहुंच जाती हैं, क्योंकि विष्णु और जगन सगे भाई हैं. अब आगे कहानी कहां जाती है और इसका अंत क्या होता है? ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी .

क्यों देख सकते हैं? फिल्म की कहानी बढ़िया है और ख़ासतौर से इसका बैकड्रॉप कमाल का है, जो कहानी के साथ मैच होता है. फिल्मांकन के दौरान गांव की  लोकेशन को बड़े अच्छे तरीके से विशाल भारद्वाज ने वैसे का वैसा ही रखा है. संवाद टिपिकल रूरल एरिया के हैं जो उस इलाके का रसपान कराते हैं. स्क्रीनप्ले अच्छा है और अभिनय लाजवाब है. फिल्म की कास्टिंग बहुत ही बढ़िया है, जिसमें अभिषेक दुहान, सानंद वर्मा और नमित दास ने अच्छा अभिनय किया है, वहीं दोनों बहनों के किरदार में सान्या मल्होत्रा और राधिका मदान ने अपना सौ प्रतिशत दिया है और कहानी देखते वक्त बिल्कुल समझ में आता है कि दोनों एक्ट्रेसेस ने किरदार में ढलने के लिए कितनी मेहनत की होगी. विजय राज की मौजूदगी, कहानी को और भी रिच बनाती है ,वहीं डिप्पर का किरदार सुनील ग्रोवर ने जिस तल्लीनता से निभाया है, वो काबिल-ए-तारीफ़ है , गांव का ऐसा किरदार जो दो लोगों के बीच आग लगाए, लेकिन समय-समय पर बड़ी बात कह जाए.  संगीत कहानी के संग-संग जाता है और बैकग्राउंड स्कोर कमाल का है.

कमज़ोर कड़ियां: फिल्म की कमजोर कड़ी इसका इंटरवल के बाद का हिस्सा है जिसकी रफ़्तार धीमी है.  इसकी वजह से लगभग सवा दो घंटे की फिल्म भी लम्बी लगने लगती है, साथ ही फिल्म में जिस अंदाज में किरदार बातें करते हैं, वो शायद एक तरह की ऑडिएंस को लाउड भी लगे, उसे दुरुस्त किया जा सकता था . फिल्म रिलीज से पहले कोई गाना भी बड़ा हिट नहीं हुआ है, जो शायद ज्यादा से ज्यादा ऑडियंस को थिएटर तक ले जाने में सहायक साबित होता. वर्ड ऑफ़ माउथ इस फिल्म को प्रचलित करने में सफल जरूर होगा.

बॉक्स ऑफिस : फिल्म का बजट लगभग 12  करोड़ बताया जा रहा है. सूत्रों की मानें तो रेलीजक से पहले ही डिजिटल, म्यूजिक और सैटेलाइट के साथ इस फिल्म ने अपनी कॉस्ट रिकवर कर ली है और जो भी वीकेंड की कमाई होगी, वो प्रॉफिट साबित होने वाली है.