नई दिल्ली दक्षिणी राज्य कर्नाटक में जारी हाईवोल्टेज प्रचार अभियान के बीच विधानसभा चुनाव के लिए मतदान में अब तीन हफ्ते से भी कम समय रह गया है. 12 मई को 224 विधानसभा सीटों पर एक चरण में मतदान होगा और 15 मई को चुनाव नतीजे आएंगे. आइए नजर डालते हैं कर्नाटक चुनाव में किन मुद्दों की चर्चा हो रही है. किन मुद्दों पर कर्नाटक का वोटर राज्य की सियासी किस्मत तय कर सकता है.


1. सियासी फेस वैल्यू


सीएम सिद्धारमैया के फेस और राहुल गांधी के धारदार अभियान के बल पर जहां कांग्रेस सत्ता बरकरार रख दूसरी पारी सुनिश्चित करने के मिशन पर जुटी हुई है तो वहीं बीजेपी को मोदी लहर और येदियुरप्पा के लिंगायत कार्ड के जरिए सत्ता में वापसी की पूरी उम्मीद है. वहीं जेडीएस भी तीसरे प्लेयर के रूप में किंगमेकर बनने की तैयारी में लगी है. कुमारस्वामी ने बीएसपी के साथ गठबंधन किया है. उनकी ताकत को भी कम करके नहीं आंका जा सकता.


2. भ्रष्टाचार के दाग किसपे कितने?


कर्नाटक चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा चुनाव प्रचार में काफी तेजी से उछाला जा रहा है. कांग्रेस जहां बीजेपी के सीएम फेस येदियुरप्पा पर पिछले कार्यकाल के दौरान लगे भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठा रही है. वहीं, बीजेपी का आरोप है कि सिद्धारमैया के शासनकाल में कर्नाटक में 3000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली लेकिन उनके चाय-बिस्किट का बिल करोड़ों में आता रहा. मैसूर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रहार करते हुए लोगों से सवाल किया कि आपको कमीशन वाली सरकार चाहिए या फिर मिशन वाली. इसपर सिद्धारमैया ने पलटवार करते हुए येदुरप्पा को निशाने पर लिया और पीएम मोदी को भ्रष्टाचार में मददगार तक कह डाला. इस बीच, तीसरे रेड्डी बंधु को टिकट देकर बीजेपी ने फिर से बेल्लारी के माइनिंग मुद्दे को अपने खिलाफ इस्तेमाल करने का कांग्रेस को मौका दे दिया है.


3. किसानों का सवाल और महादायी का मुद्दा


सिद्धारमैया सरकार के सामने पिछले 4 साल से जारी सूखे का संकट चुनावी मुसीबत बन सकता है. गोवा से महादायी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर सियासत गर्म है. महादायी या मांडोवी नदी उत्तर-पश्चिमी कर्नाटक के बेलागावी जिले के पश्चिमी घाट के भीमगढ़ से शुरू होकर गोवा होते हुए अरब सागर में मिल जाती है. महादायी नदी कर्नाटक में 29 किलोमीटर, जबकि गोवा में 52 किलोमीटर बहती है. कर्नाटक 2001 से ही गोवा से 7.6 अरब क्यूबिक फीट नदी का पानी छोड़ने की मांग करता आ रहा है. इससे वह सूखा प्रभावित धारवाड समेत 4 जिलों की जरूरतें पूरी करना चाहता है. गोवा को इसी पर आपत्ति है. हालांकि, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की पहल पर दिसंबर में गोवा के सीएम मनोहर पर्रिकर ने महादायी मुद्दे पर बातचीत कर पानी का कोटा बढ़ाने की पहल की. इसका बीजेपी को फायदा हो सकता है. महादायी नदी का मुद्दा उत्तरी कर्नाटक के लिए काफी अहम है और 25 सीटों पर इसका असर हो सकता है.  

4. विकास का एजेंडा कहां है?


दक्षिण के इस सियासी दुर्ग में मोदी के गुजरात मॉडल के सामने कांग्रेस का कर्नाटक मॉडल चुनौती पेश कर रहा है. सिद्धारमैया का दावा है कि उनकी नीतियों के कारण कर्नाटक लगातार दो साल 2016 और 2017 में निवेश के लिहाज से देश में सबसे अगड़ा राज्य रहा. सिद्धारमैया सरकार का दावा है कि उन्होंने लड़कियों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराई, राज्य को सोलर पावर में नंबर वन बनाया. लेकिन बीजेपी कांग्रेस सरकार की ग्रोथ स्टोरी को सिरे से खारिज करती है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का दावा है- ‘कांग्रेस और भ्रष्टाचार का नाता बहुत गहरा है, इतना गहरा कि जैसे मछली और पानी का होता है और सिद्धारमैया सरकार ने इसे और भी बढ़ा दिया है. आईटी सेक्टर के इतना मज़बूत होने के बावजूद यहां अभी तक 24 घंटे बिजली नहीं रहती है. स्वास्थ्य व केंद्र सरकार की स्कीम भी ठीक से अभी लागू नहीं हो पाई है. 3500 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. विकास की बात करें तो सभी मापदंडों में कांग्रेस नीचे जा रही है. हम इस हालात को बदलेंगे.’


5. कन्नड़ गौरव का सवाल


विधानसभा चुनाव से पहले कन्नड़ गौरव या कन्नड़ स्वाभिमान का मुद्दा सबसे ज्यादा सुर्खियों में है. कांग्रेस के सिद्धारमैया इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं. इसके तहत रेलवे से कहा गया कि वह टिकटों पर कन्नड़ भाषा का प्रयोग करे. केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कन्नड़ भाषा में सूचनाएं दी जाने लगीं. कई विमानन कंपनियों ने कन्नड़ भाषा में सूचना देने की शुरुआत की. इसी अभियान के तहत कर्नाटक का अलग झंडा होने की भी सिद्धारमैया सरकार ने घोषणा की और उसे कैबिनेट से पास कराकर केंद्र के पास मंजूरी के लिए भेजा गया. विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने इसे ‘एक देश’ की अवधारणा के विरुद्ध बताया, लेकिन चुनाव में कन्नड़ गौरव सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. बीजेपी को इससे मुश्किलें पेश आ सकती हैं.


6. मठों का गणित


कर्नाटक चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा धर्म और जाति का है. यहां चुनाव लड़ने वाली तीनों पार्टियां- कांग्रेस, भाजपा या जनता दल (एस), सभी धर्म और जाति के आधार पर कर्नाटक की सत्ता हासिल करने की कवायद में लगे हैं. दरअसल राज्य में विभिन्न जातियों के मठ हैं, जिनके असंख्य अनुयायी हैं. इन जातियों में लिंगायत, वोक्कालिंगा, कुरुब या अहिंदा और दलित प्रमुख हैं. कुछ हिस्सेदारी मुस्लिम वोटरों की भी है. इसलिए सभी पार्टियां इन जाति-समुदायों को अपने पक्ष में करने में लगी हैं. कांग्रेस ने लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का दांव चला है और इसके जरिए येदियुरप्पा के लिंगायत कार्ड को फेल करने की कोशिश की है. वही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह इसे लिंगायत नेता येदियुरप्पा को सीएम बनने से रोकने की कांग्रेस की कोशिश करार दे रहे हैं.


7. दक्षिण कर्नाटक और बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड


कर्नाटक में बीजेपी हिंदुत्व के एजेंडे पर जुटी है. कर्नाटक के दक्षिणी ज़िलों में जहां मुस्लिम बहुल इलाके हैं उसे लेकर बीजेपी और संघ ने माहौल बनाया है. समुद्र तट से सटे ज़िलों में भाजपा ने हिंदुत्व के मुद्दे पर काफ़ी काम किया है. वो उनका बना हुआ ग्राउंड है. मुस्लिम वोटों पर सिद्धारमैया पकड़ बनाने का दावा कर रहे हैं तो इसी कार्ड के जरिए बीजेपी हिंदुत्व का एजेंडा आगे लाने में जुटी है. बीजेपी के एक विधायक ने तो इस चुनाव को हिंदू-मुसलमानों के बीच का चुनाव तक करार दे दिया. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक में कुल 224 में से 35 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत या उससे ज़्यादा है. कांग्रेस इस वोटबैंक में जेडीएस की ओर से सेंध लगने की संभावनाओं को नकारती है. दक्षिण कन्नड़ के मंगलुरु और उडुपी ज़िलों के एक तरफ केरल का कासरगोडा का इलाका है जहां खाड़ी देशों में काम करने वाले मुसलमान पैसे कमाकर यहां अपने घर भेजते हैं और इन्ही पैसों से इस्लामिक संगठन चलते हैं. वहीं इस्लामी कट्टरपंथ के आरोप जिस संगठन पर लग रहे हैं उसका नाम है पीएफआई यानी 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इण्डिया'. इसकी सक्रियता इसी इलाके में है. विश्व हिंदू परिषद इस इलाके में सक्रिय है और लव जिहाद से लेकर लैंड जिहाद तक को चर्चा में लाने की कोशिशें लगातार देखी गई हैं.


8. जनता का घोषणापत्र


राज्य की राजधानी और देश के प्रमुख आईटी हब बंगलुरु में चुनाव को लेकर अलग ही माहौल देखने को मिल रहा है. ‘सिटिज़न्स फॉर बेंगलुरू' नामक एक स्वतंत्र समूह ने शहर के अलग-अलग हिस्सों से लोगों को एकजुट किया और उसके साथ होने वाली रोज़ाना की मुश्किलों पर चर्चा की. इसके आधार पर लोगों का घोषणापत्र बनाकर सभी राजनीतिक दलों को सौंपा गया. इसमें लोगों ने ट्रैफिक नियम, प्रदूषण नियंत्रण, कचरा प्रबंधन से लेकर नई नीतियों को लागू करने के लिए बेहतर योजनाओं जैसे मुद्दों की बात रखी. अब देखना ये होगा कि ये मुद्दे राजनीतिक दलों के एजेंडे में कितना शामिल हो पाते हैं.


9. दलित कार्ड


कर्नाटक चुनाव में दलित कार्ड भी कम मायने नहीं रखता. राज्य की आबादी में दलित समुदाय का हिस्सा करीब 20 फीसदी है. 100 सीटों पर दलित वोटबैंक असरदार है. इनमें से 36 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं. रोचक बात ये है कि कर्नाटक में दलित वोटबैंक बंटा हुआ है. सभी दलों के अपने-अपने समीकरण हैं. कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे दलित समुदाय से आते हैं. कांग्रेस एससी/एसटी एक्ट में बदलावों के मुद्दे को बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है तो बीजेपी जोरशोर से इसे कांग्रेस की भ्रम फैलाने की कोशिश करार दे रही है. हालांकि, दलितों का मडिगा समुदाय एससी में आंतरिक आरक्षण पर आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं करने को लेकर कांग्रेस से नाराज है और इनका समर्थन बीजेपी को मिल सकता है. परंपरागत तौर पर दलित वोटों पर कांग्रेस की पकड़ मानी जाती है. लेकिन 2008 के चुनावों में बीजेपी की जीत में दलित वोटों में स्विंग बड़ा कारण माना गया. तब 36 आरक्षित सीटों में से बीजेपी 22 जीतने में कामयाब रही थी. हालांकि, 2013 में कांग्रेस ने वापसी की और इनमें से 17 सीटों पर जीत हासिल की. इस वोटबैंक पर जेडीएस की भी नजर है. बीएसपी के साथ गठबंधन कर दलित वोटों को अपने पक्ष में करने की वो लगातार कोशिश कर रही है.


10. पिछले चुनाव के बाद बदले हुए समीकरण


बता दें कि 2013 के विधानसभा चुनाव में राज्य की कुल 224 सीटों में से कांग्रेस ने 122 जीती थी. जबकि बीजेपी 40 और जेडीएस ने 40 सीटों पर कब्जा किया था. बीजेपी से बगावत कर चुनाव लड़ने वाले बीएस येदियुरप्पा की केजेपी महज 6 सीटें जीत सकी थी. इसके अलावा अन्य को 16 सीटें मिली थी. हालांकि, बाद में येदियुरप्पा दोबारा से बीजेपी के साथ आ गए और इस बार सीएम उम्मीवार घोषित हैं.


2014 के लोकसभा चुनाव में हालात एकदम अलग थे. बीजेपी 28 में से 17 सीटें जीतने में कामयाब रही. जबकि 9 सीटें कांग्रेस के हाथ लगीं. 2 सीटें जेडीएस के खाते में गईं. इस बार के विधानसभा चुनाव में लिंगायत वोटों, हिंदुत्व कार्ड, मोदी लहर के सहारे बीजेपी को इस दक्षिणी राज्य में सत्ता में वापसी की उम्मीद है. देखना होगा कि कर्नाटक की जनता किन मुद्दों के आधार पर जनादेश तय करती है.