पिछले एक साल में झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी आबादी वाले राज्यों के सैकड़ों आदिवासी बाहुल्य गांव भारत से स्वायत्तता की घोषणा कर चुके हैं. झारखंड में इस आंदोलन ने एक सशस्त्र विद्रोह का आकार ले लिया है और मध्य प्रदेश व ओडिशा में, जहां यह आंदोलन अभी जड़ें जमा रहा है वहां इसने नॉन- कॉपरेटिव (असहयोग) आधारित अलगाववादी आंदोलन का रूप ले लिया है.


एक आंदोलन पत्थरगढ़ी (एक गांव के बाहर एक विशेष पत्थर रखकर) के माध्यम से, सैकड़ों, संभवत: हजारों गांवों को एक स्वायत्त क्षेत्र में बदला जा रहा है. कुछ लोग इसे 'आदिवासी गलियारा' कहते हैं तो कुछ अन्य इसे 'आदिवासिस्तान' कहते हैं.


इन पत्थरों को स्थापित करने वाले गांवों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. पत्थरों की स्थापना सांकेतिक रूप से इस बात की सूचना है कि भारत सरकार के कानून यहां नहीं चलते. सीआरपीसी व आईपीसी यहां पर लागू नहीं होते.


गांवों के अंदर पुलिसबल सहित गैर-आदिवासियों को आने की इज़ाजत नहीं है और नई गठित ग्राम सभाएं कार्यकारी, न्यायपालिका और विधायिका तीनों की भूमिकाएं अपने हाथों में ले रही हैं. चोरी से लेकर हत्या तक के मामलों का निर्णय ग्राम सभाएं खुद अपने स्तर से कर रही हैं. यहां तक कि ये गांव अपने खुद के स्कूल चलाते हैं. इन स्कूलों में सरकारी स्कूलों से जबरन बाहर निकाले गए बच्चों को दाखिला दिया जाता है और उनमें भी इस आंदोलन का प्रचार किया जाता है.


यह आंदोलन इतना तेज़ी पकड़ चुका है कि ओडिशा में एक निर्वाचित आदिवासी विधायक ने पत्थरगढ़ी का ज़िम्मा खुद अपने हाथों में ले लिया है. पुलिस इस मामले को असहाय तरीके से देख रही है. गांवों की रखवाली व सुरक्षा करने वाले आदिवासी गैंग की इन इलाकों में अक्सर पुलिस के लोगों से भिड़ंत होती है और वो पुलिस वालों को बंधक बना लेते हैं. पिछले साल झारखंड के खूंटी ज़िले में 50 सीआरपीएफ व 100 पुलिस वालों सहित एक एसपी को इन गिरोहों ने बंधक बना लिया था. बाद में डीआईजी के दखल देने के बाद ही उन्हें छोड़ा गया.


कुरुंगा गांव के एक आदिवासी नेता बिरसा ने दावा किया कि अपने दोस्तों के साथ मिलकर उसने एक साथ 25 पुलिसकर्मी को बंधक बना लिया. उसका आरोप था कि ऐसा उसने इसलिए किया क्योंकि पुलिस वालों ने उनके ग्राम प्रधान को बंधक बना लिया था. बिरसा ने कहा "हम उन्हें केवल तभी छोड़ेंगे जब वो हमारे ग्राम प्रधान को छोड़ेंगे."


खूंटी ज़िले में भंद्रा और दूसरे गांवों के आदिवासी कहते हैं कि अगर हमारे संसाधनों पर कोई भी नज़र डालेगा तो हम जान लेने और जान देने से भी पीछे नहीं हटेंगे. पत्थरगढ़ी आंदोलन कुछ फर्जी दस्तावेजों व संविधान की गलत व्याख्या के आधार पर प्रेरित है, जिसके अनुसार उनका मानना है कि जहां पर आदिवासियों की संख्या अधिक है, वहां उनको शासन का अधिकार है और वही भारत के वास्तविक मालिक हैं.

उनका दावा है कि अंग्रेज़ों द्वारा भारत सरकार को सत्ता का हस्तांतरण 1870 में सिर्फ 99 सालों के लिए किया गया था, जो कि 1969 में खत्म हो गया. इसलिए अब आदिवासियों को प्रभावित करने वाले आदेशों को ब्रिटिश 'प्रिवी काउंसिल' द्वारा स्वीकृति मिलनी चाहिए. विधानसभा या संसद के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा बनाए गए कानून यहां लागू नहीं होंगे. ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पत्र और आधार जैसे सभी पहचान पत्र को ये आदिवासी-विरोधी मानते हैं.


एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा ने कहा कि यह सब इसलिए किया जा रहा है, ताकि अफीम/पोस्ता पैदा करने वालों को पैसे कमाने में मदद की जा सके. अफीम का सीज़न अप्रैल में खत्म हो जाएगा उसके बाद इनके नेता अपना हिस्सा लेकर नौ दो ग्यारह हो जाएंगे. लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये है कि ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले और मध्य प्रदेश के डिंडोरी ज़िले, जहां पर ये आंदोलन काफी बढ़ रहा है, वहां पर अफीम या पोस्ता की खेती नहीं होती है.

पत्थरगढ़ी के तेजी से बढ़ने के कारण बहुत सारे कारण हैं - कई पुलिस अधिकारी ऑफ द रिकॉर्ड कहते है कि झारखंड में नक्सली अफीम की खेती को बढ़ावा दे रहे हैं और पत्थरगढ़ी आंदोलन इसको ढकने का की कोशिश है. कुछ लोगों का कहना है कि ये विपक्षी पार्टियों की सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ आदिवासियों को खड़ा करने की एक चाल है. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह ईसाई मिशनरियों की एक चाल है ताकि वो इन क्षेत्रों में अशांति पैदा करके अपने प्रभाव को बना के रख पाएं.


ऐसा ही एक गांव सोनपुर है, जहां न्यूज़18 पत्थरगढ़ी समारोह का खुद गवाह बना. इस समारोह में हजारों आदिवासी, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, उनमें से लगभग 3,000 लोग धनुष, तीर, गंड़ासा और कुल्हाड़ी लेकर आए थे, जैसे कि वो जंग लड़ने जा रहे हों.

ऐसे ही एक विशाल समारोह का उद्घाटन एक भगौड़े आदिवासी नेता जोसेफ पूर्ति ने किया. झारखंड के खूंटी ज़िले में 60 से ज़्यादा गांव अब पत्थरगढ़ी गांव बन चुके हैं. हालांकि कुछ गांव ऐसे भी हैं जो कि स्वशासन की बात नहीं करते.


लेकिन आदिवासियों का यह दर्द पूरी तरह से गलत नहीं है. आदिवासी बताते हैं कि किस तरह से वर्षों से उनकी अनदेखी की गई. उन क्षेत्रों में आज भी अधिकतर लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, उनके पास पीने को पानी नहीं है और आज तक बिजली नहीं पहुंची है.


आदिवासियों ने बताया कि बड़े-बड़े बांध वाली परियोजनाओं के कारण वो बेघर हो गए क्योंकि राज्य सरकार ने न ही कोई मुआवजा दिया और न ही रहने के लिए दूसरा घर दिया. उद्योंगों ने उनके गांवों को पूरी तरह से निगल लिया और उन्हें बेघर कर दिया. इसलिए वे नाराज़ हैं. जब इन फल-फूल रहे उद्योगों से भी उन्हें कुछ नहीं मिला तो वो अपने को और भी कटा हुआ और उपेक्षित महसूस करने लगे.

मध्य प्रदेश में डिंडोरी के निकट एक गांव के एक आदिवासी ने बताया कि राज्य हम लोगों से पूरी तरह कटा हुआ है वो हमारी समस्याओं पर ध्यान नहीं देता. आदिवासी इलाकों में 'फास्ट रेल प्रोजेक्ट' पर काम चल रहा है लेकिन इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहा कि हम भूख से मर रहे हैं.


ये तो नहीं पता कि आने वाले दिनों में यह अलगाववादी आंदोलन किस दिशा में जाएगा लेकिन इतना ज़रूर है कि ये आदिवासी अपने उद्देश्य के लिए मरने-मारने की बात करते हुए ज़रा भी दबते नहीं हैं. इन क्षेत्रों में बड़े स्तर पर चुनाव बहिष्कार किया जा रहा है और अब इन गांवों में चुने हुए प्रतिनिधियों का स्वागत नहीं किया जाता.


आदिवासियों में पत्थरगढ़ी और अलगाववादी आंदोलन जंगल के आग की तरह फैल रहा है और प्रशासन को भनक भी नहीं लग रही कि इससे किस तरह से निपटा जाए, खास कर इस समय.