इंदौर  फिल्मों को बुरा मानने की हमारी दशकों पुरानी मानसिकता धीरे-धीरे बदल रही है, मगर अब भी हम फिल्म देखने में गर्व करने के बजाय अपने इस कृत्य को छुपाने की कोशिश करते हैं। खासतौर पर मध्यम वर्ग के लोगों के बीच फिल्म देखने के बाद कहीं न कहीं 'गिल्टी' का भाव रहता है।


अच्छी से अच्छी फिल्म देखने के बाद भी परिवार के सदस्य घर आने के बाद उस पर विस्तार से चर्चा करने में हिचकते हैं। जबकि अगर सब मिलकर फिल्म में एक्टिंग, डायरेक्शन, कोरियोग्राफी, कैमरा वर्क जैसे पहलुओं पर चर्चा करेंगे तो न केवल वो फिल्म को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे, बल्कि विश्लेषण करने के ये तरीके उन्हें जिंदगी के दूसरे क्षेत्रों को समझने-समझाने में भी काम आएंगे।


ये कहना है राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता सिने लेखक मनमोहन चड्ढा का। वे एक कार्यक्रम में शिरकत करने बुधवार को शहर आए। नईदुनिया से चर्चा में उन्होंने कहा कि हम घर में फिल्मों की बात नहीं करते मगर बच्चों को 'फिल्म मेकिंग कोर्स" कराने में संकोच नहीं करते हैं। ये घोड़े को गाड़ी के पीछे बांधने जैसा है। जबकि सही तरीका तो ये होगा कि हम फिल्म को लेकर बेजा हिचक दूर करें। इसके बाद उसे जो भी कोर्स कराना हों, कराएं।


इसके लिए जरूरी है कि फिल्में स्कूली कोर्स में पढ़ाई जाएं। जब हम कहानियों और उपन्यासों को कोर्स में शामिल कर सकते हैं तो फिल्मों में क्या बुराई है? भारत में हर साल डेढ़ हजार से ज्यादा फिल्में बनती हैं। क्या, उनमें से इक्का-दुक्का भी ऐसी नहीं होतीं, जिन्हें कोर्स में शामिल कर बच्चों को इस मीडियम के बारे में समुचित जानकारी दी जा सके।


चुनौती, अच्छी फिल्मों और दर्शकों के गैप को भरने की


श्री चड्ढा ने कहा कि अच्छी फिल्मों और दर्शकों के बीच गैप को भरना इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। हमारे यहां बहुत अच्छा सिनेमा बन रहा है, मगर दर्शक सुपरस्टार्स और बड़े बजट वाली कमर्शियल फिल्मों को ही मिलते हैं। खासतौर पर हमारे यूथ को सत्यजीत रे, विमल राय, गुरुदत्त, कुमार साहनी, मणि कौल जैसे निर्देशकों की फिल्में जरूर देखना चाहिए।


इनकी फिल्मों से उनके मन में सिने विधा को लेकर गर्व की अनुभूति होगी। इसके अलावा उन्हें मंथन, दो आंखें बारह हाथ, तीसरी कसम, प्यासा और कागज के फूल जैसी क्लासिक फिल्में भी नियमित रूप से देखना चाहिए, ताकि वो सीखने के साथ-साथ सिनेमा की शानदार परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें।