गुजरात के चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी का कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनना उनके लिए सकारात्मक भी है और चुनौतीपूर्ण भी. सकारात्मक इसलिए क्योंकि राहुल की बदलती छवि में गुजरात चुनाव के दौरान की उनकी सक्रियता का बड़ा योगदान है. अध्यक्ष बनने से पहले राहुल जिस तैयारी और तेवर के साथ गुजरात चुनाव में उतरे हैं, वो अभूतपूर्व है. और उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ साफ नज़र आ रहा है. यह नया अवतार कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके नए दायित्व को और मज़बूत भी करता है.


लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं. और इन चुनौतियों के मद्देनज़र राहुल का गुजरात में जीतना या बेहतरीन प्रदर्शन करना बहुत ज़रूरी है. दरअसल, अध्यक्ष के रूप में उनके नाम की घोषणा के एक सप्ताह बाद ही गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव परिणाम आ रहे हैं और इन नतीजों के आधार पर राहुल को या तो वाहवाही मिल रही होगी और या फिर उन्हें कुछ तीखे सवालों के जवाब देने होंगे.


आइए डालते हैं एक नज़र ऐसे कुछ अहम कारणों पर-


हारी बाज़ी को जीतना, हमें आता है


राहुल के आलोचक कहते हैं कि उनके पूरे राजनीतिक करियर में केवल और केवल हार ही बसी हुई है. वो जहां भी प्रचार करने गए, पार्टी हारती रही. लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का पद उनकी मां सोनिया गांधी के पास होने के कारण राहुल की मौजूदगी में हार कांग्रेस पार्टी की हार भी मानी जाती रही. अब, जबकि वो पार्टी अध्यक्ष बन गए हैं और एक बाहरी चेहरे के बजाय गुजरात में लोगों के बीच रचे-बसे नज़र आ रहे हैं, इस चुनाव में कांग्रेस का हारना सीधे तौर पर उनकी हार मानी जाएगी. आलोचक कहेंगे कि चाहे कमान, पार्टी और सर्वाधिकार राहुल को दे दो, उनकी किस्मत में हार ही है. गुजरात में जीत ही राहुल की इस छवि को बदल सकती है.

ढाक के तीन पात


राहुल निःसंदेह नए अवतार में नज़र आ रहे हैं. उनके बारे में लोगों के बीच धारणा तेज़ी से बदलती महसूस हो रही है. राहुल का आत्मविश्वास बेहतर नज़र आ रहा है और उनका बोलना, चीज़ों का जवाब देना, हाज़िरजवाबी भी सुधरी नज़र आ रही है. पहली बार राहुल एक परिपक्व नेता की तरह दिखाई दे रहे हैं. उन्हें विपक्ष भी मृगछौना मानने की भूल नहीं कर सकता है. लेकिन गुजरात की एक हार उनपर हास-परिहास के तीखे हमले फिर से करने का मौका खोल देगी. राहुल की छवि में सुधार को इस वक्त एक प्रत्यक्ष प्रमाण की ज़रूरत है और यह गुजरात चुनाव के परिणामों से तय हो जाएगा.

नए सेनापति में यकीन


राहुल के लिए गुजरात जीतना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि उनकी अपनी पार्टी में उन्हें गंभीरता से लिया जाए, इसके लिए आवश्यक है कि वो खुद को साबित कर पाएं. राहुल पूरा ज़ोर लगाकर भी अगर गुजरात में कांग्रेस की नैया पार नहीं लगा पाते हैं तो वो किस आधार पर बाकी राज्यों में अपने पार्टी के चेहरों से जीत की गारंटी का वचन लेंगे. आने वाले दिनों में राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव होंगे. वहां भी पार्टी के नए नेता उभर रहे हैं. राहुल उनसे जीत की गारंटी तभी मांग सकते हैं जब वो खुद ऐसा करके दिखाएं.


भितरघात का डर


कांग्रेस पार्टी में एक बड़ी तादाद ऐसे नेताओं की है जो राहुल स्टाइल राजनीति में धीरे-धीरे हाशिए पर ढकेल दिए जाएंगे और कम प्रासंगिक रह जाएंगे. ऐसे में अगर राहुल गुजरात हार जाते हैं तो यही नेता पार्टी के अंदर असंतोष को हवा देंगे. गुटबाज़ी और सोनिया लाओ, कांग्रेस बचाओ जैसे नारे भी दिए जा सकते हैं. यहां तक कि पार्टी में नीचे के स्तर पर कार्यकर्ता का हतोत्साहित होना संगठन को बचाने और फिर से खड़ा करने की दृष्टि से बहुत भारी पड़ सकता है. राहुल को इस वक्त अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह भी भरना है और राहुल विरोधी तत्वों का मुंह भी बंद कराना है. इसलिए भी उनका जीतना ज़रूरी है.



मोदी का विकल्प


गुजरात चुनाव के ठीक बाद का पूरा एक साल यानी 2018 अगले आम चुनाव के लिए देश में राजनीति खड़ी करने का वक्त है. इस समय राहुल की जीत ही उन्हें विपक्ष और मोदी से असंतुष्ट लोगों के लिए एक विकल्प के तौर पर सामने ला सकती है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो विपक्ष राहुल में संभावनाएं देखने से इनकार करेगा और बंटा विपक्ष मोदी के खिलाफ एक व्यापक रणनीति तैयार करने से चूक जाएगा.


अगले आम चुनाव में मोदी और भाजपा की राजनीति का विकल्प बनने के लिए और उसका नेतृत्व कर पाने के लिए ज़रूरी है कि राहुल यह चुनाव जीतें. गुजरात में उनकी जीत एक बड़ा संदेश लेकर जाएगी जिसका असर आगामी विधानसभा चुनावों में भी दिखेगा और राष्ट्रीय राजनीति पर भी.


इस तरह राहुल की बढ़ी हुई शक्ति ही उन्हें विपक्ष के किसी बड़े मंच को संचालित कर पाने की क्षमता भी देगी.