वास्तु-शास्त्र की दृष्टि से मकान सही ढंग से निर्मित न होने पर व्यक्ति के जीवन पर कई प्रकार की समस्याएं बनी रहती हैं। वास्तु के अनुसार यह माना जाता है कि घर निर्माण शुरू करने से पहले भूमि पूजा करनी चाहिए। यह एक शुभ शुरुआत माना जाता है और आगे की कार्यवाही करने के लिए एक अच्छी शुरुआत है, एेसे होती  और कईं उपाय हैं जिनके बारे में वास्तु में बहुत अच्छे से वर्णन किया गया है। जब आप अपने घर का निर्माण कार्य शुरू करते है तो यह सबसे अच्छा समय है जब आपको वास्तु को ध्यान में रखना चाहिए। वास्तु एक विशाल इमारत के अंदर और हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के दोहन के लिए प्रयोग में लाया जाता है। लेकिन अगर घर में वास्तु दोष उत्पन हो जाए तो घर के सदस्यों को बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। तो आईए वास्तु दोष के निवारण के लिए कुछ एेसे उपाय जो फायदेमंद हो सकते हैं।

 

इन बातों का ध्यान रखें: 

अत: सुखी जीवन के लिए भवन निर्माण हेतु वास्तु -शास्त्र के प्रमुख नियमों को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए क्योंकि नक्शा बनाने वाला आर्किटैक्ट एक उत्तम डिजाइन वाला भवन तो बना सकता है परंतु उसमें रहने वाले प्राणियों के सुखी जीवन की गारंटी नहीं दे सकता जबकि वास्तुशास्त्री इस बात की गारंटी देता है, अत: वास्तुशास्त्र के आधार पर आदर्श मकान कैसा हो, इसकी बिंदुवार संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है: 

 

घर, दुकान और आॅफिस का मुख्य द्वार, उत्तर, पूर्व, पश्चिम में सर्वश्रेष्ठ होता है तथा गृह स्वामी के लिए यश, वैभव, सुख, संपन्नता के साधन बनाता है, परंतु दक्षिणमुखी मुख्यद्वार या दक्षिण से वायु और रोशनी, सूर्य की किरणें आने से विभिन्न विपत्तियां घेरने लगती हैं। उदाहरण के लिए गृहलक्ष्मी एवं धन-लक्ष्मी नष्ट होने लगती है, पत्नी का स्वास्थ्य ढीला, पति-पत्नी में मनमुटाव व कटुता, मुकद्दमेबाजी, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति, धन हानि तथा अन्य नुक्सान, बच्चों की शिक्षा अपूर्ण या परेशानियों के साथ होना  इत्यादि। 

 

इसके निवारण के लिए समय-समय पर साबुत (छिलके वाली) उड़द को जल में प्रवाहित करें और मार्बल या मिट्टी का बंदर मुख्य स्थान में रखें जिससे सूर्य की अशुभता दूर हो जाती है, क्योंकि पति-पत्नी में इन दिनों संबंध विच्छेद का एक मुख्य कारण यह भी है।

 

गैस एवं बिजली के उपकरण आग्नेय (दक्षिण पूर्व) कोण में रखें तथा मंदिर में भी धूप-अगरबत्ती आग्नेय कोण में रखें। कभी भी (उत्तर-पूर्व कोण) ईशान  दिशा में न रखें, अन्यथा मानसिक क्लेश रहेगा।

 

घर को हमेशा चौरस (चौकोर या आयताकार अर्थात चौड़ाई से लम्बाई दूनी हो) बनाएं।

सीढिय़ों के नीचे कभी भी रसोई, टायलैट इत्यादि न बनाएं, नहीं तो पीढ़ी-दर पीढ़ी पुत्र, पुत्रियां एवं पुत्रवधू आदि परेशान होंगे। उन्हें कोई जानलेवा बीमारी होने लगेगी, जातक का कारोबार, व्यापार नष्ट होने लगेगा और ऊपरी हवा (भूत प्रेत, पिशाच) आदि का प्रभाव पडऩे लगेगा।

 

घर या दुकान दक्षिण दिशा में ज्यादा ऊंची, पश्चिम में ऊंची भारी, पूर्व एवं उत्तर में खाली हल्की, नीची या कम ऊंची व कम भारी रखें। कमरों एवं घर में सामान भी इसी प्रकार रखें। उत्तर एवं पूर्व में भारी एवं ऊंचा सामान रखने से व्यापार-कारोबार में रुकावटें, मानसिक परेशानियां आने लगेंगी, अत: घर एवं कमरों के बीच के स्थान को भी खाली (अन्यथा हल्का सामान) रखें, क्योंकि यह ब्रह्म स्थान है। यहां कोई सामान भूल कर भी न रखें।