नई दिल्ली: 2017 में 5 राज्यों- उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं जिस कारण इस साल को काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि लोग किसके हाथ में राज्यों की सत्ता की कमान सौंपेगी और किसे बाहर करेगी इस पर सबकी नजरें है। इस बार पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव काफी मायने रखते हैं। पंजाब में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी दस्तक दी है जिस कारण पंजाब में भाजपा-अकाली, कांग्रेस और आप के बीच कड़ा मुकाबला है दूसरी ओर यूपी में दोबारा सपा आएगी या भाजपा का कमल खिलेगा, इसका फैसला जनता करेगी लेकिन अभी वहां पिता-पुत्र में आपसी मन-मुटाव चल रहा है जिसका फायदा दूसरी पार्टियां उठाने की पूरी कोशिश में हैं। इन सबके बीच इसी साल जुलाई में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल खत्म हो रहा है और नए राष्ट्रपति का चुनाव होगा।

विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की खास नजरें क्योंकि अगर भाजपा उत्तर प्रदेश और पंजाब में जीतने में नाकाम रही तो उन्हें अपनी पंसद का राष्ट्रपति नहीं मिल पाएगा और उसके चुनाव के लिए उन्हें दूसरे दलों के मान्य शख्स की ओर जाना पड़ेगा। मौजूदा हालात में एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं और उन्हें अपने  राष्ट्रपति कैंडिडेट को सीधे चुनाव जिताने के लिए करीब एक लाख और वोटों की जरूरत है। जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां 1,03,756 वोट दांव पर हैं। इसमें सबसे ज्यादा यूपी में 83,824 वोट हैं। ऐसे में अगर मोदी सरकार विधानसभा चुनाव हारती है तो  राष्ट्रपति पद के कैंडिडेट को जिताने के लिए जरूरी संख्या नहीं होगी तो फिर उन्हें अन्य क्षेत्रीय दलों से बात करनी होगी। ऐसे में अन्य दलों का एनडीए के उम्मीदवार पर सहमत होना जरूरी है। इस स्थिति में एनडीए को अपने कैंडिडेट का चयन सोच-समझकर से करना होगा जो सभी दलों को मान्य हो। जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्रसमिति जैसी पार्टियों का रुख अहम होगा।

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ऐसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव
हमारे देश में राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका अनूठा है। राष्ट्रपति पद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाता है।
 इसमें लोकसभा, राज्यसभा के चुने हुए सांसद और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक हिस्सा लेते हैं। विधायकों के वोट का मूल्य 1971 की आबादी के आधार पर एक निश्चित अनुपात में तय किया जाता है। सभी राज्यों और दिल्ली-पुड्डुचेरी विधानसभाओं के कुल मतों के बराबर लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 238 मेंबर्स के वोटों का मूल्य होता है।

प्रेजिडेंट का चुनाव एक निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज करता है। संविधान के आर्टिकल 54 में इसका उल्लेख है। यानी जनता अपने प्रेजिडेंट का चुनाव सीधे नहीं करती, बल्कि उसके वोट से चुने गए लोग करते हैं। यह है अप्रत्यक्ष निर्वाचन।

इस चुनाव में एक खास तरीके से वोटिंग होती है, जिसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहते हैं। यानी वोटर एक ही वोट देता है, लेकिन वह तमाम कैंडिडेट्स में से अपनी प्रायॉरिटी तय कर देता है। यानी वह बैलेट पेपर पर बता देता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी, तीसरी कौन। यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिए इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है।

वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का वेटेज भी अलग होता है। यह वेटेज जिस तरह तय किया जाता है, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कहते हैं।