ऐक्ट्रेस स्वरा भास्कर और ऐक्टर सुमित व्यास डायरेक्टर गौरव सिन्हा की पहली फिल्म ‘आपके कमरे में कोई रहता है’ में एक इंट्रेस्टिंग जोड़ी के रूप में नजर आने वाले हैं। क्या है इसमें खास? हम आपको बताते हैं।

पिछले साल आई फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ की सीधी-साधी चंदा यानी एक्ट्रेस स्वरा भास्कर का चौंकाने वाला मॉडर्न अंदाज, गुड बॉय सुमित व्यास का दिलफेंक और रंगीन मिजाज अवतार, इन दोनों के बीच प्यार और फिर में प्यार में कन्फ्यूजन, ये सब दिखेगा डायरेक्टर गौरव सिन्हा की पहली फिल्म ‘आपके कमरे में कोई रहता है’ में। 'तनु वेड्स मनु', 'रांझणा' और 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' जैसी हिट फिल्मों के डायरेक्टर आनंद एल राय के असिस्टेंट रहे गौरव इस रॉमकॉम फिल्म के साथ डायरेक्शन में कदम रख रहे हैं।

घूंघट में घूम रहीं स्वरा
इस फिल्म में स्वरा के लुक को इस कदर सीक्रिट रखा जा रहा है कि वह शूटिंग के दौरान हर वक्त घूंघट से अपना चेहरा ढके हुए नजर आती हैं। स्वरा का कहना है, ‘मेरे किरदार में एक लुक छिपाकर रखा जा रहा है, क्योंकि वो काफी इंट्रेस्टिंग है। इसलिए हम काफी मेहनत कर रहे हैं उसे छुपाने के लिए। गौरव तो मुझे हर वक्त हिजाब में ही रख रहे हैं, इसलिए जो हमारी फोटोज भी हैं, उनमें भी मैं घूंघट में दिख रही हूं। सबमें मेरा सिर ढंका हुआ है, मैंने शॉल ओढ़ी हुई है। हालांकि, ये अच्छा है क्योंकि इससे इंट्रेस्ट बना रहेगा और सरप्राइज होगा लोगों के लिए।’

अपने किरदार के बारे में स्वरा बताती हैं, ‘यह एक शहरी कामकाजी लड़की का रोल है, जो सोचती है कि वह बड़ी सेंसिबल है, लेकिन वो होता है ना कि हम सोचते हैं कि हम बड़े सेंसिबल हैं और ऐसी बेवकूफियां हम करेंगे नहीं, लेकिन जब अपने पर पड़ती है तो हम उतने ही बेवकूफ साबित होते हैं। ये भी ऐसी ही लड़की है, लेकिन एक इंटेलिजेंट और स्मार्ट लड़की है और एक बड़ी मजेदार केमिस्ट्री है इसमें सुमित व्यास के साथ।’

कन्फ्यूजन भरी केमिस्ट्री से कॉमिडी
इस फिल्म में सुमित और स्वरा के बीच एक कन्फ्यूजन भरी लव स्टोरी देखने को मिलेगी, जिसे देख ऑडियंस की हंसी छूट जाएगी। बकौल स्वरा, 'यह बहुत ही मजेदार फिल्म है। इसकी नैरेशन सुनते वक्त मैं पूरे टाइम हंसती रही। इसलिए नहीं कि यह स्लैपस्टिक कॉमेडी है, बल्कि वो इतनी रियलिस्टिक लगी कि लगा कि यार, ऐसी बेवकूफियां तो हमने भी की हैं। रिश्तों की कहानी है। उसमें जो उलझनें होती हैं, उसकी कहानी है। आज की जो शहरी और यंग जेनरेशन है, उसे सबसे ज्यादा आजादी है, जो इतिहास में शायद ही कभी इस उम्र के लोगों के पास रही हो, लेकिन होता क्या है कि इससे इतनी ज्यादा चॉइस मिल जाती है कि कन्फ्यूजन हो जाता है कि चाहिए क्या लाइफ में। ऐसे किरदारों को केंद्र में रखकर फिल्म बनाई गई है, जो बहुत ही रियलिस्टिक है। यह हल्के-फुल्के सब्जैक्ट वाली कमर्शल रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है, फिर भी इसमें कुछ भी टिपिकल नहीं है। फिल्म की खासियत ही यही है कि जहां आपको ये लगेगा कि ये होने वाला है, वहीं कुछ और हो जाएगा।’

सुमित को रास आई रंगीनमिजाजी
सुपरहिट वेब सीरीज 'पर्मानेंट रूममेट्स' से मशहूर हुए ऐक्टर सुमित व्यास इस फिल्म में अपनी गुड, स्वीट और फनी बॉय की इमेज के बिल्कुल उलट एक प्लेबॉय किस्म के लड़के का रोल निभा रहे हैं। अपने रोल को लेकर खासे एक्साइटेड सुमित कहते हैं, 'मैं अच्छे लड़के, भले लड़के का रोल कर-करके बोर हो चुका था। इसलिए मेरा बड़ा मन था कि थोड़ा अलग किस्म का किरदार करूं। इस फिल्म में मेरा किरदार रंगीनमिजाज इंसान का है। उसके कई सारे इश्क चलते रहते हैं एक साथ। वैसा मैंने कभी किया नहीं है और ये मेरी पर्सनैलिटी के भी थोड़ा विपरीत है, इसलिए मुझे बड़ा मजा आया ये रोल करने में। मैंने सोचा कि रियल लाइफ में तो मैं वैसा नहीं बन सकता, केसेनोवा और प्लेबॉय टाइप का, क्योंकि मुझमें है नहीं वो कुव्वत, लेकिन मैं स्क्रीन पर तो बन ही सकता हूं, इसलिए मैं इस किरदार को लेकर बहुत एक्साइटेड हूं।'

कन्फ्यूजन कोई बुरी चीज नहीं
मॉडर्न जेनरेशन के बीच रिलेशनशिप को लेकर कन्फ्यूजन कॉमन बात है, जबकि पहले के रिश्तों में एक ठहराव था। सारी आजादी और इतनी चॉइसेस होने के बावजूद इस कन्फ्यूजन की वजह पूछने पर स्वरा कहती हैं, ‘पहले तो मुझे नहीं लगता कि कन्फ्यूजन कोई बुरी चीज है। आप बड़े हो रहे होते हैं, तो खुद को डिस्कवर कर रहे होते हैं। हम कहते हैं कि पिछले जमाने में लोग बड़े स्टेबल थे। आज डिवॉर्स बढ़ गए हैं, पर सच ये है कि पहले उनके पास इतनी आजादी नहीं थी। पहली बार ऐसा हुआ है कि औरतों के पास चॉइस है कि जिस रिश्ते में वो नाखुश हैं, उससे निकल पाएं। वरना सदियों से यही होता रहा है कि चाहे जो हो, आपको उस रिश्ते को निभाना ही है।'

'स्टेबिलिटी के नाम पर आजीवन दु:खी रहना, मुझे नहीं लगता यह सही है। इसलिए मेरा मानना है कि कन्फ्यूजन हमेशा बुरी चीज नहीं होती है। कन्फ्यूजन डिस्कवरी या क्लैरिटी के पहले वाला फेज है। इसकी वजह यही है कि अब आजादी है सवाल उठाने की, लेकिन मेरे हिसाब से सवाल पूछने की आजादी भी होनी चाहिए, अपनी सरकार से भी, अपने आस-पास के लोगों से भी, अपने रिश्तों से भी। जवाब पाने के लिए सवाल उठाना तो जरूरी है ना। वो कोई बड़ा अच्छा समाज नहीं है, जहां सवाल पूछने की आजादी ना हो। हम ऐसे समाज की ओर आगे बढ़े, जहां सबके पास उतने ही समान अवसर हों अपनी निजी जिंदगी में खुशी तलाशने के। वो चाहे हेट्रोसेक्सुअल हो या समलैंगिक हों। मेरे लिए किसी भी सिचुएशन में ज्यादा आजादी और कन्फ्यूजन वाला समाज कम आजादी और बंधन वाले समाज से बेहतर है।'