ब्रह्मांड में स्थित समस्त ग्रह, नक्षत्र एवं तारागणों की भ्रमणशीलता से निरंतर परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों में दिन-रात का हम प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। सर्दी, गर्मी, वर्षा आदि ऋतुओं का अनुभव करते हुए जीवन-यापन करते हैं। रात-दिन की निरंतरता एक विशिष्ट समूह बनकर अवधि का मापदंड हो जाती है। इनमें भी कभी रात बड़ी होती है, तो कभी दिन और कभी दोनों समान होते हैं। जब समान होते हुए रात्रि मान बढऩे या घटने लगता है तो उसे नवीन रात्रि या नवरात्र के नाम से संबोधित किया जाता है। वास्तव में ये होने वाला परिवर्तन हमारी दिनचर्या पर अपना प्रभाव डालता है। 


वर्ष 2017 में पौष माह के शुक्ल पक्ष कि अष्टमी गुरुवार 5 जनवरी से शाकंभरी नवरात्र का प्रारंभ हो रहा है। तंत्र-मंत्र के साधकों को अपनी सिद्धि के लिए खास माने जाने वाली वनस्पति की देवी मां शाकंभरी की आराधना करेंगे। शाकंभरी नवरात्र का समापन पौषी पूर्णिमा के दिन 12 जनवरी, गुरुवार 2017 को होगा। 9 दिन तक तंत्र-मंत्र के साधक मनचाही सिद्धियों को अंजाम देने के लिए वनस्पति की देवी मां शाकंभरी की आराधना करेंगे।

शुभ मुहूर्त

अष्टमी तिथि- 5 जनवरी 2017 6:30 पर शुरू होगी।
अष्टमी तिथि समाप्त- 12 जनवरी 2017 को 4:55 पर। 


स्वरुप: देवी शाकंभरी आदिशक्ति दुर्गा के अवतारों में से एक हैं। दुर्गा के सभी अवतारों में से रक्तदंतिका, भीमा, भ्रामरी, शाकंभरी प्रसिद्ध हैं। दुर्गा सप्तशती के मूर्ति रहस्य में देवी शाकंभरी के स्वरूप का वर्णन है जिसके अनुसार इनका वर्ण नीला है, नील कमल के सदृश ही इनके नेत्र हैं। ये पद्मासना हैं अर्थात् कमल पुष्प पर ही ये विराजती हैं। इनकी एक मुट्ठी में कमल का फूल रहता है और दूसरी मुट्ठी बाणों से भरी रहती है।


मंत्र: शाकंभरी नीलवर्णानीलोत्पलविलोचना। मुष्टिंशिलीमुखापूर्णकमलंकमलालया।।


पौराणिक कथा: पौराणिक मतानुसार एक समय में भूलोक पर दुर्गम नामक दैत्य के प्रकोप से लगातार सौ वर्ष तक वर्षा न होने के कारण अन्न-जल के अभाव में समस्त प्रजा त्राहिमाम करने लगी। दुर्गम नामक दैत्य ने देवताओं से चारों वेद चुरा लिए थे। देवी शाकंभरी ने दुर्गम नामक दैत्य का वध कर देवताओं को पुनः वेद लौटाए थे। देवी शाकंभरी के सौ नेत्र हैं इसलिए इन्हें शताक्षी कहकर भी संबोधित किया जाता है।


देवी शाकंभरी ने जब अपने सौ नेत्रों से देवताओं की ओर देखा तो धरती हरी-भरी हो गई। नदियों में जल धारा बह चली। वृक्ष फलों और औषधियों से परिपूर्ण हो गए। देवताओं का कष्ट दूर हुआ। देवी ने शरीर से उत्पन्न शाक से धरती का पालन किया। इसी कारण शाकंभरी नाम से प्रसिद्ध हुईं। महाभारत में देवी शाकंभरी के नाम का उल्लेख इस इस श्लोक के रूप में किया गया है।


श्लोक: दिव्यं वर्षसहस्त्रं हि शाकेन किल सुब्रता, आहारं सकृत्वती मासि मासि नराधिप, ऋषयोऽभ्यागता स्तत्र देव्या भक्त्या तपोधनाः, आतिथ्यं च कृतं तेषां शाकेन किल भारत ततः शाकम्भरीत्येवनाम तस्याः प्रतिष्ठम्।