छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में एक बार फिर असंवेदनहीनता देखने को मिली है. राजधानी रायपुर स्थिति अंबेडकर अस्पताल के डॉक्टरों ने जिंदगी और मौत से लड़ रही एक नन्हीं बच्ची का बिना पैसों के इलाज करने से मना कर दिया है. पैसों की व्यवस्था नहीं कर पाने पर मजबूर मां अपनी बेटी को वापस घर ले आई और उसे तिल-तिल मरते हुए देखने पर विवश है. पूरा मामला गरियाबंद के छुईया गांव का है.

15 दिसंबर को 5 साल की नन्हीं ट्विंकल अचानक चिमनी की आग में झुलस गई, उसका चेहरा सहित शरीर का पूरा अगला हिस्सा बुरी तरह जल गया. आसपास कहीं बर्न यूनिट नहीं होने के कारण उसकी मां उसे अंबेडकर अस्पताल लेकर गई. दो दिन तक उसे वहां रखा गया, मगर डॉक्टरों ने आगे उसका इलाज करने से मना कर दिया.

बच्ची की मां नंदनी ने बताया कि डॉक्टर 2-3 हजार की दवाई बाहर से लाने पर ही इलाज शुरू करने की बात कहते रहे, लेकिन उसके पास इतने पैसे नहीं थे.

बच्ची दो दिन अस्पताल में भर्ती रही, लेकिन डॉक्टरों ने उसका इलाज नहीं किया. मजबूरीवश अंत में बच्ची को घर ले आई और फिलहाल कर्ज लेकर गांव के ही प्राइवेट डॉक्टर से इलाज करवा रही है. नंदनी के पति अब इस दुनिया में नहीं है.

घर की पूरी जवाबदारी उसी के कंधों पर है. वह विधवा सास और दो बच्चों का मजदूरी करके पालन पोषण करती है. ऐसे में उसे चिंता हो रही है कि आखिर उसकी बच्ची का इलाज कैसे होगा.