दवा एक सटीक विज्ञान नहीं है, लिहाजा एक उपचार के परिणाम की गारंटी नहीं दी जा सकती है। ऐसे में उपचार के बाद वांछित परिणाम नहीं मिलने पर डॉक्टर को लापरवाही के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

14 जून, 2012 को घर पर गिर जाने के कारण सतेंद्र कुमार के दाहिने पैर की हड्डी टूट गई। उन्होंने बताया कि दिल्ली में इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल डॉक्टर राजू वैश्य ने सर्जरी करके उसके पैर में रॉड डाली और कुछ दिनों के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

इसके बाद 23 मई, 2013 को वह फिर एक दुर्घटना के शिकार हो गए और इस बार उनके बाएं पैर में फ्रैक्चर हो गया। उन्होंने फिर से उसी अस्पताल ले जाया गया और डॉक्टर राजू ने ही उनकी सर्जरी कर तीन दिन बाद छुट्टी दे दी। हालांकि सतेंद्र सर्जरी से संतुष्ट नहीं था।

9 अप्रैल, 2014 को उसके दाएं पैर का एक और ऑपरेशन किया गया और कुछ दिनों के बाद छुट्टी दे दी गई। सतेंद्र ने दावा किया है कि जनवरी 2016 से वह बाएं पैर में गंभीर दर्द का सामना कर रहा है और चलने में परेशानी का सामना कर रहा था।

उसने फिर से डॉक्टर वैश्य से परामर्श किया था और उन्होंने भी अन्य डॉक्टरों से सलाह लेकर बाएं पैर के दोबारा ऑपरेशन कराने की सलाह दी। यह ऑपरेशन डॉक्टर साधू के साकेत सिटी अस्पताल में किया गया।

बाद में अगस्त 2016 में सतेंद्र ने राष्ट्रीय आयोग के समक्ष इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल और डॉ राजू वैश्य के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत दायर की। उसने दावा किया कि वह चार साल से काम करने में असमर्थ है। उन्होंने आरोप लगाया कि उसके दाहिने पैर में डाला रॉड टेढ़ी हो गई और यह उसे इलाज में की गई लापरवाही है।

उन्होंने कहा कि वित्तीय नुकसान और पीड़ा की वजह से उसे 2 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया जाए। आयोग ने पाया कि लापरवाही 2012 में हुई थी, लेकिन शिकायत चार साल बाद दायर की गई। आयोग ने इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में डॉक्टर वैश्य द्वारा दर्ज की गई डिस्चार्ज समरी को भी देखा, जिसमे कहा गया था कि सतेंद्र उस समय आराम महसूस कर रहा था।

आगे की जांच के बाद में आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि इस बात के कोई सबूत नहीं थे कि डॉक्टर वैश्य ने लापरवाह की थी। आयोग ने 30 नवंबर को दिए अपने आदेश में कहा कि डॉक्टर ने कोई लापरवाही नहीं की थी। आयोग ने पाया कि इस बात का कोई औचित्य नहीं है कि उपचार के परिणाम अनुकूल नहीं मिला, तो डॉक्टर दोषी है।