गरीबी, कम उम्र में पिता को खोने का दर्द और सिर पर पक्की छत नहीं होने का दर्द झेल रही दो आदिवासियों बेटियों ने मिसाल पेश की हैं. अति सीमित संसाधनों के बावजूद दोनों नेशनल लेवल की प्लेयर है और अब उनका ख्वाब देश के लिए खेलना है.

 

मध्य प्रदेश के छोटे से शहर मंदसौर में झोपड़ी में रहने वाली लगभग 14 साल की साघु डावर को शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय के ग्राउंड में अक्सर हाथों में हॉकी लेकर गेंद के साथ जूझते देखा जा सकता है. लेकिन, उसका पारिवारिक जीवन भी संघर्षों से भरा है.

 

दो बार नेशनल में एमपी टीम की नुमाइंदगी कर चुकी साघु के पिता का निधन हो चुका है, जबकि मां मजदूरी और दूसरों के घर बर्तन मांजकर जिंदगी की गाड़ी को पटरी पर लाने की कवायद में जुटी रहती है. शासकीय नूतन मिडिल स्कूल में पढ़ने वाली साघु सिर्फ हॉकी नहीं खेलती,  बल्कि अपनी पढ़ाई का खर्चा भी खुद उठाती है. इसके लिए वह दूसरों के घरों में बर्तन मांजती है. इससे मां को भी थोड़ी आर्थिक मदद हो जाती है.

 

तमाम दिक्कतों के बावजूद साघु ने भारतीय हॉकी टीम में शामिल होने के ख्वाब को कमजोर नहीं होने दिया. रितु रानी को आदर्श मानने वाली साघु भी उनकी तरह टीम इंडिया में शामिल होकर दुनिया में अपने मुल्क का नाम रोशन करना चाहती है. साघु कहती हैं, 'मैं भारतीय टीम की जर्सी पहनकर देश को गौरवान्वित करना चाहती हूं.'

 

साघु के कोच अविनाश श्रीवास्तव  खास बातचीत में बताते हैं कि, इस टैलेंटेड  खिलाड़ी पर उनकी नजर सबसे पहले स्कूल सिलेक्शन टूर्नामेंट के दौरान पड़ी थी. अविनाश उस दिन को याद कर बताते हैं कि, पहली ही नजर में उन्हें अहसास हो गया कि, ये लड़की कुछ खास है और हॉकी में बड़ा नाम कर सकती है. पिछले दो साल में अपने इस कोच की ट्रेनिंग ने साघु को इतना पारंगत कर दिया कि वह अब नेशनल लेवल में अपने सूबे की नुमाइंदगी कर रही है.

 

साघु की तरह ही उसकी सहेली और हॉकी में सीनियर संगीता भामोर की कहानी भी संघर्ष के आंच में तपकर हीरा बनने की है. उसके भी पिता नहीं है और मां मजदूरी कर किसी तरह परिवार का खर्च उठाती है. मुश्किलों से हार मानना संगीता ने कभी सीखा नहीं था. उसने तमाम दिक्कतों को पीछे छोड़कर हॉकी खेलना जारी रखा. साघु की तरह वह भी नेशनल लेवल प्लेयर है.

 

पिछले 23 साल के हॉकी की कोचिंग कर रहे अविनाश श्रीवास्तव बताते हैं कि दुनिया में हॉकी का स्वरूप काफी बदल गया है. लेकिन, मंदसौर में राष्ट्रीय खेल के लिए उचित मैदान नहीं है. ऐसे में उत्कृष्ट स्कूल के पथरीले और असमतल मैदान पर ही वे नेशनल प्लेयर की फौज तैयार कर रहे है. कोच को अपनी इन दो आदिवासी खिलाड़ियों के एक दिन बड़ा प्लेयर बनने की उम्मीद है. शायद उनकी सफलता इस शहर में हॉकी के लिए अच्छे दिन लेकर आए, इस बात की दुआ हर खेली प्रेमी करता है.