देहरादून, प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में यूं तो चारों ओर नैसर्गिक सौन्दर्य बिखरा है लेकिन कुछ इलाके और गांव ऐसे है जहां प्रकृति ज्यादा ही मेहरबान रही है.जनपद देहरादून के पर्वतीय अंचल में एक ऐसा ही गांव है जहां चारों ओर सुन्दरता की चादर बिछी है.

चकराता तहसील से मात्र 30 किमी की दूरी पर स्थित ये गांव पर्यटन मानचित्र पर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है.कहते हैं गांव में जीवन बसता है लेकिन पहाड़ के गांव में जीवन के साथ साथ प्रकृति भी बसती है.

देहरादून के पर्वतीय क्षेत्र चकराता से त्यूणी मोटर मार्ग पर ऐसा ही गांव बसा है जहां वसुन्धरा ने दिल खोल कर अपना सौन्दर्य बिखेरा है. गांव का नाम है कोटी कनासर.देवदार के घने जंगलों और सेब के बागानों से घिरा कोटी कनासर चकराता तहसील से मात्र तीस किमी की दूरी पर स्थित है.

राज्य सरकार ने इस गांव को पर्यटन ग्राम के रुप में चयनित तो किया और कागजों में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कुछ कार्य भी किए लेकिन आज गांव में पर्यटन गतिविधियों से जुड़े कोई कार्य नही दिखाए देते.

कोटी कनासर को तो बस पर्यटकों का इन्तजार कर रहा है. समुद्र तल से लगभग 7 हजार फीट की ऊचाई पर स्थित कोटी कनासर सांस्कृतिक और बागवानी की दृष्टि से समृद्व है.गांव में राजमा,आलू,सेब,टमाटर सहित कई प्रकार के फल और सब्जियों का उत्पादन किया जाता है.

कोटी कनासर में लकड़ी के नक्काशीदार भवन है जो पहाड़ की वास्तुकला का नायाब नमूना प्रस्तुत करते है.पर्यटन विभाग की ओर से यहां वर्ष 2013 में ट्रेनिंग कार्यक्रम भी संचालित किए गए लेकिन प्रकृति की ऐसी धरोहर को विकसित करने के लिए विभाग ने कोई पहल नही की.क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी की माने तो विभाग ग्रामीण पर्यटन को बढावा देने की योजनाएं तैयार कर रहा है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कोटी कनासर को पर्यटन मानचित्र पर कब जगह मिलेगी.