मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। इनका वाहन वृषभ है इसलिए इनको वृषोरूढ़ा और उमा के नाम से भी जाना जाता है। देवी सती ने जब पुनर्जन्म ग्रहण किया तो इसी रूप प्रकट हुईं इसीलिए देवी के पहले स्वरूप के तौर पर माता शैलपुत्री की पूजा होती है। मां शैलपुत्री की उत्‍पत्ति शैल से हुई है। नवदुर्गाओं में प्रथम देवी शैलपुत्री अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं। यह त्रिशूल जहां भक्तों को अभयदान देता है, वहीं पापियों का विनाश करता है। बाएं हाथ में सुशोभित कमल का पुष्प ज्ञान और शांति का प्रतीक है।
मां दुर्गा की षोड्शोपचार पूजा की जानी चाहिए। नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री स्वरूप की पूजा में सभी नदियों, तीर्थों और दिशाओं का आह्वान किया जाता है। नवरात्र के पहले दिन से आखिरी दिन तक घर में सुबह-शाम कपूर को जलाने से नकारात्‍मक ऊर्जा दूर होती है। शैलपुत्री का ध्यान एवम जपनीय मंत्र इस प्रकार है

वन्दे वांछितलाभाय, चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां, शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता ॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम् ।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम् ॥

मंत्र
ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।