ईश्वर अनादि है, उसका न कोई अंत है और न ही आरंभ है। वह निर्गुण है, निराकार है। उस अजन्मा ईश्वर की प्रार्थना सिख धर्म में भी कुछ इस प्रकार की जाती है।

एक औं सतनाम कर्तापुरुष निर्भउ निर्बैर

अकाल मूरत अजूनी सैभं गुरुप्रसाद जप ।

आदि सच , जुगादि सच , है भी सच,

नानक होसी भी सच । वाहे गुरु ॥

भावार्थ- परमात्मा एक है। उसका नाम सत्य है, अर्थात् वह सदा स्थिर और एकरस है। सृष्टिका कर्ता है, निर्भय और निर्वैर है । उसका स्वरूप काल से परे है , वह समय के चक्रमें कभी नहीं आता। मृत्यु, रोग और बुढ़ापा उसके लिये नहीं है। वह अजन्मा है, स्वयम्भू है , पथ - प्रदर्शक है और कृपा की मूर्ति है । हे मनुष्य! तू उसे जप।