बैतूल। कोरोना के खौफ और लॉक डाउन के सन्नाटे को तोड़ने का काम प्रकृति ने किया। बुधवार दोपहर में मौसम ने करवट बदली । आसमान में बादल गरजने लगे, बारिश जैसा माहौल होने लगा। हिन्दू नव वर्ष और चैत्र नवरात्र की शुरुआत खमोशी से होना प्रकृति को रास नही आया। खैर बुधवार शाम तक प्रशासन ने अपने होम डिलेवरी प्लान को भी सार्वजनिक करना शुरू कर दिया। उन सप्लायर की जानकारी और नम्बर सार्वजनिक कर दिए जिन्हें इन हालात में व्यवस्था बनाने के लिए अनुमति दी गई है। पर 21 दिन के लॉक डाउन में अभी इसे पर्याप्त नहीं माना जा रहा। 


- यह कदम उठाना है बेहद जरूरी..
1. किराने की होम डिलेवरी के लिए किस क्षेत्र के लिए अनुमति दी गई। उनके कांटेक्ट नम्बर या सप्लाई व्यवस्था का फार्मूला बताए। 
2. सब्जी की आपूर्ति और सप्लाई के लिए क्या विकल्प होगा , लोगो तक कैसे पहुचेगी, किन से सम्पर्क करना होगा। 
3. जिन्हें अनुमति दी जा रही कहीं वे मौके का फायदा उठाकर कालाबाजारी या मनमानी न करें, उसके लिए कहाँ किसे शिकायत की जा सकेगी। 
4. मेडिकल स्टोर के कर्मचारी या बैंक कर्मी इस लॉक डाउन में न उलझे इस के लिए अनुमति का स्पष्ट विकल्प दिया जाए। 
5. स्वास्थ्य सेवा के लिए हेल्प डेस्क और हेल्प लाइन नम्बर और बढ़ाए जाए, उसकी सही जानकारी लोगों  को आसानी से उपलब्ध हो। 
6. लोगों तक हर तरह के हेल्प लाइन नम्बर आसानी से पहुँचे इसके लिए हर सम्भव और निरन्तर प्रयास हो।

-जिन्हें छूट है उनकी सुरक्षा और सुविधा का प्लान हो ...
पुलिस कर्मी, स्वास्थ कर्मी या मीडियाकर्मी, सफाईकर्मी को भी पूरी सुरक्षा और सुविधा का विकल्प हो। वे अगर दिन भर खुले में है तो उन्हें भी यह पता होना चाहिए कि वे भी इन हालात में आम लोगों की तरह ही असुरक्षित हैं। उन्हें भी पर्याप्त सावधानी के लिए ताकीद किया जाए। वे भी किसी तरह से लापरवाह न हों और घर के बाहर खुले में होने से किसी भी संदिग्ध के सम्पर्क में आने का इन्हें ज्यादा खतरा है। इसलिए छूट में शामिल लोगों के लिए भी प्लानिंग जरूरी है। कोई भी चूक किसी को भी भारी पड़ सकती है । 

- प्राइवेट अस्पताल, क्लिनिक को लेकर भी प्लान जरूरी...
जो हालात है उसमे जनरल ओपीडी बन्द की जा चुकी है। ऐसे में लोगो के पास प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर्स ही आसान विकल्प है। इसलिए प्रशासन के लिए जरूरी है कि उन्हें भी सचेत करें और ताकीद करें कि हर तरह की स्थिति से स्वास्थ्य विभाग को अवगत कराते रहें। चूंकि प्राइवेट में एमबीबीएस से लेकर बीएमएस, बीएचएमएस और झोला छाप तक दुकान लगाकर बैठे हैं इसलिए इन तक स्वास्थ्य विभाग की पहुच जरूरी है। इनसे फीडबैक और सूचना मिलना भी जरूरी है।

-बड़ी चुनौती यह भी है कि मजदूरों के लिए क्या विकल्प...
जो रोज दिहाड़ी से अपना पेट पालते है उनके लिए विकल्प सामने नहीं आया। हफ्ते दस दिन का मसला होता तो भी ठीक था पर अब 21 दिन और गुजराना है ऐसे में इनके लिए बेकअप प्लान भी जरूरी है। विशेष कर ग्रामीण मजदूर तबके के लिए अभी तक कोई विकल्प सामने नहीं आया है। इस वर्ग के लिए ध्यान दिया जाना जरूरी है। अभी तक सरकार की ओर से जो घोषणा इस वर्ग के लिए हुई है। उसे मूर्तरूप में किस तरह लागू किया जावेगा यह भी बडा़ सवाल है क्योंकि शहर और गांव दोनों ही स्तर पर यह बड़ा तबका है।