रायपुर।    छ्ठ बिहार, क्षारखण्ड, पूंर्वाच्चल तथा नेपाल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है।इसकी महत्ता इतनी है कि बिहारी मूल के लोग दुनिया के किसी भी कोने हिस्से में रहेवे अपने पैतृक घर परिवार जरूर लौटते हैं या लौटने की पुरी कोशिश करते हैं और जो नही जा पाते, वो अपने आसपास ही छोटा-सा बिहार और पूर्वाच्चल बना लेते है। आज हालात यह है भारत के सभी शहरों कस्वों के साथ-साथ दुनिया के अनेक देशों में छ्ठ पर्व घुमधाम व पुरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। छत्तीसगढ में भी ऐसा कोई शहर  नगर नहीं है जहाँ छठ व्रतियों की भीड नहीं जुटती।

      अपनी ऊर्जा से समस्त जगत को चलायमान रखनेवाले सूर्यदेव और उनकी माता अदिति की प्रमुख रूप से अराघना का ये छ्ठ पर्व संभवतः सनातन हिन्दू संस्कृति के प्राचीनतम् त्यौहारों में से एक मात्र लोकपर्व है। किंवदंतियों की माने तो दीनानाथ (सूर्यदेव) और छ्ठी मैया (माता) की उपासना चार दिन होती है। बैसे जब त्यौहार इतना पुराना हो और उससे गहरा लगाव हो तो आस्था का सैलाब हर कहीं होना स्वाभाविक है। लेकिन अगर जो इस बार घर से दूर हैं तो आप अपने पैतृक प्रान्त का एक प्रतिरूप अपने पास ही तैयार करना चाहते है तो मेरा इस लेरव में वार्णित विधि-बिघान आपकी कुछ मदद जरूर कर सकते हैं।

     हमारे देशमें सुर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छ्ठ मूलतः सूर्य षट्टी ब्रत होने के कारण इसे छ्ठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चौत्र में और दुसरी वार कार्तिक में। चौत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छ्ठ पर्व को चौती छ्ठ तथा कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर बनाये जाने वाले छ्ठपर्व को कार्तिक( कतकी)छ्ठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तभा मनोंवांक्षित फलप्राप्ति के लिए छ्ठ पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरूष समान रूप से मनाते हैं। लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और षष्ठी मैया का सम्बन्ध पुत्र और माता का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पुजा सूर्य ने ही की थी। छ्ठ पर्व की परम्परा में बहुत गहरा विज्ञान छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि (छ्ठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है। उस समय. सूर्य की परावैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथा संभव रक्षा करने का सामर्थ इस परम्परा में है।

    छठ पर्व का धार्मिक महत्व-

सूर्मषष्टी अथवा छ्ठ पूजा सूर्योपासना का महोत्सव है। सनातन घर्म के पांच प्रमुख देवताओ मैं से एक सूर्यनारायण हैं। वाल्मीकि रचित रामायण में आदित्य हृदय स्त्रोतके द्दारा सूर्यदेव का जो स्तवन किया गया है, उससे उनके सर्वदेवमय सर्वशाक्तिमय स्वरूप का बोध होता है। सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च सूर्य सूक्त के इस वेद मंत्र के अनुसार भगवान सूर्य को सम्पूर्ण जगत का आत्मा कहा गया है। सूर्य का अर्थ सरति आकाशे सुवति कर्माणि लोक प्रेरयति वतलाया गया है, अर्थात आकाश में चलते हुए लोक में जो कर्म की प्रेरणा दे, उसे सूर्य कहा गया है। पुराणों में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है। मोदनी में सूर्य को ग्रह विशेष बतलाया गया है। सूर्य के व्युप्पत्ति लभ्य अर्थ के अनुसार आकाश मण्डल से संचार की प्रेरणा देते हुए जो ग्रहों के राजा है, वही सूर्य है। पौरोहित्य शास्त्र के अनुसार सूर्य का जन्मस्थान कलिन्ग देश, गोत्र-कथ्यप, रक्त-वर्ण है। ग्रहराज होने के कारण ज्योतिष शास्त्र मानता है कि ग्रहों की अनुकूलता हेतु भगवान भाष्कर की पूजा करनी चाहिए।पूजन में अर्ध्य का विघान मिलता है। कहा गया है कि सूर्य को अर्ध्य.देने से पाप विनिष्ट हो जाते हैं। स्कन्दपुराण में तो स्पष्ट उल्लेख है कि सूर्य कि सूर्य को वगैर अर्ध्य दिये भोजन तक नहीं करना चाहिएद्यपौरोहित्य शास्त्र के अनुसार अर्ध्य में आठ बस्तुओं का समावेश अर्थात जल, दूघ, कुश का अगला भाग, दघि, अक्षत, तिल, यव और सरसों को अर्ध्य का अंग बतलाया है। अर्ध्य देने के लिए तांबे एंव पीतल की घातु के लोटे (जलपात्र) का प्रयोग करना चाहिएद्य शास्त्रों के अनुसार उगते हुए सूर्य एंव डूबते हुए सूर्य के सामने अर्ध्य देना चाहिए। पुराणों के अनुसार सूर्यदेव षष्ठ अर्थात छठवें दिन तेजोमय प्रकाश के साथ माता अदिति के समक्ष प्रकट हुए थे, इसीलिए माता अदिति को छ्ठी-मैइया के स्प में स्तुति की जाती है। ब्रती प्रसिद्ध छ्ठ पूजा के अवसर पर विशेष रन्य से सांय एव प्रातःकालीन सूर्य को अर्ध्य देकर सूर्य षष्ठी (छठ) ब्रत का परंम्परागत रूप से अनुपालन कर पवित्रता एंव तपस्या को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाते है।

 

     लोक उत्सव का स्वरूप-

            छ्ठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरूआत चौत्र कार्तिक शुक्लपक्ष चतुर्थी को तभा समाप्ति चौत्र कार्तिक शुक्लपक्ष सप्तमी को होती है। झ्स दौरान व्रतघारी स्त्री पुरूष लगातार 36 घंटे का निर्जला ब्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते

 कार्तिक छ्ठ व्रत 2020का विवरणः

’18 नवम्बर 2020, बुधवारः नहाय खाय

’19नवम्बर2020, गुरूवारः खरनापूजा

’20नबम्बर2020, शुक्रवारः संध्या अर्ध्य

’21नवम्बर2020, शनिवारः प्रातः अर्ध्य

  .                 ( क ) नहाय खाय

       पहला दिन शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथी को नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है।  आमावस्या तिथी से सबसे पहले घर की पुरी तरह सफाई कर उसे पावित्र बनाया जाता है। इसके वाद लाल रंग की खाद्य जैसे टमाटर यादि खाना पूर्णतः वर्जित हो जाता है। छ्ठ व्रत की तैयारी शुरू हो जाता है तभा चुल्हा यदि का निर्माण किया जाता है। शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथी को प्रातः काल व्रती स्नान ध्यान से निवृत होकर सुद्धता और  पावित्रता से निर्मित साकाहारी भोजन का सेवन करता/करती है। इसी के साथ छ्ठ ब्रत की शुरूआत हो जाता है। परिवार के सभी सदस्य व्रती। के भोजनोपंरात ही भोजन गहण करते हैं। भोजन के रूप में कददु (लौकी)-दाल और चावल ओल( जीमीकंदा),हरा वैगन, गोभी की शब्जी तथा चना दाल सेंधा नमक में बनाया हुआ खाने की परम्परा है।

          ( ख ) लोहंडा और खरना

दुसरे दिन अर्थात शुक्ल पक्ष पंचमी तिथी को व्रतघारी दिनभर निर्जला उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ’’खरन’’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए सभी परिजनोंको निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप खीर, घी लगा रोटी, चना दाल, चावल तथा चावल का पिट्ठा विशेष रूप से बनाया जाता है। गन्ने का रस यदि उपलब्ध हो तो उसे प्रमुखता दी जाती है अन्यथा गुड का उपयेग होता है लेकिन प्रसाद में नमक या चीनी का उपयोग नही किया जाता है। खरना का विशेष प्रसाद सोहारी (घी लगा हुआ विशेष रोटी) और रसिया (गन्ना का रस अथवा गुड का खीर) होता है जिसे व्रती रात्रि में पूजा- अर्चना के वाद ही ग्रहण करता हैा इसी के बाद शुरू होता है व्रती का 36घंटे का कठोर निर्जला व्रत। विशिष्ट हालात में व्रती यदि मजबुरी हो तो रात्री में गौमुखी (गाय की तरह शरीर की अवस्था बनाकर) जल गहण किया जा सकता है। छ्ठ ब्रत के दौरान स्वच्छता और पावित्रता का विशेष रन्प से ध्यान ररवा जाता हैा

        ( ग )  संध्या अर्ध्य

तीसरे दिन अर्थात शुक्ल षष्ठी को दिन में छ्ठ प्रसाद बनाया जाता हैा प्रसाद के रूप मैं ठेकुआ, जिसे टिकरी भी कहते हैं, इसके अलावा चावल के लडडू ( लड्डुआ) बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा (चीनी का एक विशिष्ट साचा में बना मिठाई), गन्ना और फल भी छ्ठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पुरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्ध्य का सूप सजाया जाता है ओर ब्रति के साथ परिवार और परिजन लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छ्ठव्रती एक नीयत नदी, तालाव, पोखर के किनारे एकत्र होकर सामूहिक रन्पसे अर्ध्य दिया जाता है तथा छ्ठी मैया का प्रसाद भरे रूप से पूजा की जाती है । अर्ध्य के साथ ही हुमाद से हवन किया जाता है जिसमें व्रती के वाद घाट पर उपस्थित सभी लोग भाग लेते हैं। पूजन में  सूर्य की पत्नी ।। प्रत्यूषा।। और उनसे उत्पन्न सूर्यपुत्र।। शनिदेव।। की भी अर्चना की जाती हैाछ्ठी मैइया की प्रसाद भरे सूप लेकर ब्रती जल में स्नान  कर खड़ी हो जाती है 1 तत्पश्चात परिजन द्वारा सूर्य को जलऔर दुघ का अर्ध्य दिया जाता है। इस दौरान कुछ घण्टे के लिए वहाँ मेले का दृथ्य बन जाता है।

       (  घ )  उषा अर्थात प्रातः अर्ध्य, चौथे दिन अर्थात शुक्ल पक्ष सप्तमी की शुबह उदियमान सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। ब्रती अपने पुरे प्रियजनों के साथ उसी स्थान पर पुनः एकत्र होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्ध्य दिया था। पुनः पिछली संध्या की प्रक्रिया की पुनरावृति होती है तथा हुमाद से कण्डे ( गोबर का बना) से अग्नि प्रञ्जवलित कर ह्वन करते है । विशेष रूप से सूर्यदेव की ब्याहता पत्नी उषा और उनसे उत्पन्न पुत्र यम तभा यमी की भी पुजा-अर्चना की जाती है। अन्त में ब्रती कच्चे दुध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं। तत्पश्चात घाट पर उपस्थित सभी पारिजनों को प्रसाद वितरित किया जाता है।

               ( ङ)  व्रत

               छ्ठ त्यौहार मूलतः इतिहास के पन्नों में दर्ज।। मगध।। जनपद का महापर्व है लेकिन अब इसकी व्यापकता सम्पूर्ण भारत ही नही वल्कि विथ्वव्यापी हो गया है। छ्ठ न सिर्फ आस्था का महापर्व है बल्कि श्रद्धा की महापरीक्षा भी है। छ्ठ उत्सव के केन्द्र में एक कठिन तपस्या की तरह है। व्रत रखने वाले स्त्री को परबैतिन भी कहा जाता है।  चार दिनों के इस व्रत में ब्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता हैापर्व के लिये आरक्षित विशेष कमरे में ही व्रती फर्स जमीन पर एक कबंल चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है समहिलाएं साड़ी और पुरूष घोती पहनकर छ्ठ करते हैं। शुरू करने के बाद छ्ठ पर्व को सालो-साल तक करना होता है। जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित स्त्री पुरूष को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर परिवार में किसी की मृत्यू हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है। छ्ठ व्रत प्रमुख रूप से पुत्र-पुत्री की प्राप्ति हेतु, सन्तान की लम्बी उम्र के लिए, निरोगी शरीर और परिवार की सुख समृद्धि के लिए किया जाता है।

      . व्रत करने वाले सभी ब्रती सुवह से ही स्नान कर गेहूं सुखाते हैं। इस वात का विशेष तौर से ध्यान रखा जाता है कि कोई पशु-पक्षी इन दानों को चुगने नहीं पाये आमावश्या के वाद पुरे छः दिन लहसुन, प्याज आदि का पुरे परिवार में सेवन पूर्णतः वर्जित होता है। पकवान, प्रसाद बनाते समय शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। तीसरे दिन सूर्यास्त के समय तथा चतुर्थ दिन प्रातः काल पति-पुत्र में से कोई सिर पर बहगी( प्रसाद से भरा टोकरी) रखकर अपने परिवार व इस्टों के साथ पास के घाट पर जाते हैं। अर्ध्य में तीन चीजें का विशेष महत्व है, बांस से बना सूपा, टोकरी और प्रसाद। प्रसाद में सामान्यतः ठेकुआ, मौसमी फल, गन्ना, नारियल आदि रखे जाते हैं। व्रती पहले नदी, तालाव में स्नान करते हैं। फिर गीले ही कपडे पहने ही  प्रसाद को सुपे में रखकर दोनों हाथ से पकड़कर जल में खड़े हो जाते हैं। दीपक भी जलता रहता है। सभी परिजन दोनो समय (संध्या, प्रातः) बारी-बारी से अर्ध्य देते हैं। अर्ध्य देने के बाद  गोबर कें कंडे से जलते हुए आग में सामान्यतः शुद्ध व पवित्र घी में मिला हुआ हुमाद से हवन किया जाता है। व्रती के वाद सभी हवन करते हैं। हवन सम्पन्न होने के वाद व्रती व्रत तोड़ता है। व्रती के प्रसाद गहण करने के बाद घाट पर उपस्थित सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित किया जाता है। तदुपरान्त वचे प्रसाद की टोकरी को लेकर सभी अपने-अपने घर लौट जाते है। था प्रसाद वितरित करते हैं। कार्तिक मास की तरह ही चौत्र मास की शुक्ल पक्ष की षष्टी तिथी को छ्ठ पूजा का आयोजन इसी तरह घुमघाम से मनाया जाता हैा छ्ठ पर्व के दिनों में माहौल पूर्णतः घार्मिक होता है तथा महिलायें विशेष रूप से सूर्यदेव और छठी मईया की सामुहिकं गीत गाकर पुरे वातावरण को आध्यात्मिक बनाने में कोई कसर शेष नहीं रखती हैे।