बैतूल.अगर एक कांटा भी चुभ जाए तो वो बेहद तकलीफदेह होता है लेकिन बैतूल (betul) में एक ऐसा समुदाय है जो कांटों के बिस्तर पर (bed of thorns) सोता है. ये उनकी मजबूरी नहीं बल्कि परंपरा है, जिसे वो खुशी-खुशी निभा रहे हैं. अपने इस उत्सव को वो भोंडाई कहते हैं. ये समुदाय खुद को पांडवों का वंशज (The descendants of Pandavas) बताता है.

बैतूल ज़िले में रज्झड़ समाज है. खुद को पांडवों का वंशज बताने वाले इस समाज के रीति-रिवाज और पंरपराएं अजब-ग़ज़ब हैं. कांटे के मायने ही हैं मुसीबत और तकलीफ. लेकिन ये समुदाय कांटों को खुशी-खुशी गले लगाता है. वो कांटों का बिस्तर बिछाता है और फिर उस पर लोटता है.
 पांडवों के वंशज
रज्झड़ समुदाय के लोग बैतूल के सेहरा गांव में रहते हैं. कांटों की सेज पर लेटकर वो अपनी एक परंपरा निभाते हैं. इस पर्व का नाम भोंडाई है. समाज के लोग खुद को पांडवों का वंशज बताते हैं.इस आयोजन के पीछे एक किवदंति है. ये मानते हैं कि भोंडाई पांडवों की मुंहबोली बहन थीं. उनकी विदाई के वक्त पांडवों को कांटों पर लेटकर खुद को सही साबित करना पड़ा था. तब से वो अगहन मास में इस परंपरा को निभाते चले आ रहे हैं.
बेर के कांटों का बिस्तर
इस भोंडाई पर्व के लिए समुदाय के लोग कई दिन पहले से बेर के कंटीले पेड़ और डाल इकट्ठा करने लगते हैं. वो इन्हें सुखाते हैं, फिर मुख्य आयोजन वाले दिन गाजे बाजे के साथ झाड़ियों को लेकर अपने पूजन स्थल तक लाते हैं. फिर कंटीली झाड़ियों से कांटों की सेज बनाकर उस पर बारी बारी से लोटते हैं.
 हैरत की बात
हैरत की बात ये है कि रज्झड़ समुदाय के लोगों को कांटों पर इस तरह लोटने के बावजूद कोई तकलीफ नहीं होती. कुछ ही देर में वो सामान्य भी हो जाते हैं. इस आयोजन में हर उम्र के लोग शामिल होते हैं. भोंडाई को लेकर और भी कई किवंदतियां कही-सुनीं जाती हैं. लेकिन उन्हें लेकर कोई एकमत नहीं है.