अगर आप डॉक्टर बनना चाहते हैं और इसके लिए किसी भी छोटे से देश में जाकर डिग्री हासिल करना चाहते हैं तो एक बार फिर सोच लें क्योंकि ऐसे डिग्री लेकर आप एक प्रकार से ठगे जा रहे हैं। देश में डॉक्टर बनने की उम्मीदें रखने वाले कई छात्र जब एडमिशन नहीं मिलता तो नेपाल, बांग्लादेश, यूक्रेन और कजाखस्तान आदि देशों की ओर रुख करते हैं पर जब डॉक्टर बनने के बाद स्वदेश लौटते हैं तो उनका सपना टूट जाता है। इसका कारण यह है कि इन विदेशी डिग्री धारी डॉक्टरों को प्रैक्टिस करने के पहले मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित एक परीक्षा को पास करना होता है। उसी के बाद ये नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं।
देश में कई छात्रों को इसी कारण डिग्री होते हुए भी बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है। यह छात्र डॉक्टर बनने के लिए पिछड़े देशों में इसलिए जाते हैं क्योंकि वहां दाखिला आसानी से मिल जाता है।  इसके अलावा पढ़ाई में खर्च भी कम आता है।
छात्रों के लिए मेडिकल काउंसिल की यह स्क्रीनिंग परीक्षा पास करना आसान नहीं होता और इसके लिए छात्रों को कोचिंग तक का सहारा लेना पड़ता है। साल में दो बार होने वाली इस परीक्षा को कई छात्र पास नहीं कर पाते ऐसे में उन्हें नौकरी नहीं मिलती और न ही वे कहीं प्रैक्टिस करने के योग्य रहते हैं।
इसके बाद भी देश से हर साल हजारों छात्र मेडिकल की पढ़ाई के लिए कम विकसित देशों की ओर रुख करते हैं। यहां से कुछ छात्र खाड़ी देश में नौकरी के लिए चले जाते हैं पर जो नहीं जा पाते हैं उनके लिए राह बेहद कठिन हो जाती है।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का मानना है कि कम विकसित देशों में मेडिकल की पढ़ाई का स्तर काफी कम होता है, ऐसे में वहां से डिग्री लेने वाले छात्र तय मानको को पूरा नहीं कर पाते।
भारत में केवल विकसित देशों के मेडिकल संस्थानों के छात्रों को ही मेडिकल काउंसिल मान्यता देती है।