ईरान,ईरान-अमेरिका की दुश्मनी की कहानी पुरानी है. ये वहीं से शुरू होती है, जहां लोग जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद सड़कों पर उतरे हुए हैं. दरअसल, साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई थी. इसके बाद सबसे पहला शिकार राजधानी तेहरान में अमेरिकी दूतावास ही बना था. हज़ारों लाखों छात्रों की भीड़ ने दूतावास पर चढ़ाई कर दी थी. और वहां काम कर रहे अमेरिकी अधिकारियों और कर्मचारियों को बंधक बना लिया था. उनकी एक ही मांग थी. अमेरिका फौरन से पेशतर मोहम्मद रज़ा पहेलवी को ईरान वापस भेजे ताकि ये मुल्क उसके किए का उससे हिसाब ले सके. मगर सवाल ये है कि आखिर कौन था ये मोहम्मद रज़ा पहेलवी और अमेरिका इसे क्यों बचा रहा था. इसे जानने के लिए करीब 70 साल पीछे जाना पड़ेगा.

पुराने दौर में पर्शियन एम्पायर था और अब इसे ईरान कहा जाता है. 25 सौ साल तक इस देश पर कई राजाओं ने हुकूमत की. जिन्हें शाहों के नाम से जाना गया. 1950 में ईरान की जनता ने मोहम्मद मुसादिक के रूप में एक धर्मनिर्पेक्ष राजनेता को प्रधानमंत्री चुना. सत्ता में आते ही मुसादिक ने ईरान के तेल का फायदा सीधे अपने लोगों तक पहुंचाने के लिए ब्रिटिश और यूएस पेट्रोल होल्डिंग का राष्ट्रीयकरण कर दिया. ये वो वक्त था जब दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध से उभर चुकी थी. और अमेरिका को यकीन हो चला था कि उसके अंदर सुपर पॉवर बनने की पूरी सलाहियत भी है और मौका भी. लिहाज़ा 1953 में उसने ब्रिटेन के साथ मिलकर एक साज़िश के तहत मुसादिक का तख्तापलट कर दिया. और एक लोकतांत्रिक देश को राजशाही में तब्दील कर मोहम्मद रज़ा पहेलवी को ईरान का नया शाह बना दिया.


22 साल का शाह उस वक्त मशहूर था अपनी अय्याशियों और फिज़ूलखर्चियों के लिए. कहतें हैं आलम ये था कि उसकी पत्नी पानी नहीं दूध में नहाया करती थी. जबकि शाह का लंच रोज़ाना पेरिस से मंगवाया जाता था. इस बात की परवाह किए बगैर कि उसके अपने मुल्क में लोग भूखे मर रहे थे. पहेलवी राजवंश पर फिर से खतरा ना मंडराए और सत्ता पहेलवी राजवंश के ही पास रहे इसलिए पहेलवी राजवंश के आखिरी शाह मोहम्मद रज़ा पहेलवी ने अपनी एक बेरहम आतंरिक पुलिस सवाक की स्थापना की. जिसका एक ही काम था राजवंश के खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज़ को बड़ा बनने से पहले ही कुचल देना.

वहीं दूसरी तरफ दुनिया में ग्लोबलाइज़ेशन के दौर पर बाज़ारतंत्र हावी होने लगा था. मगर इसके लिए ज़रूरी था ईरान का पश्चिमी रंग में रंगना. और शाह ने अगला क़दम यही उठाया. ईरान के बाज़ार को दुनिया के लिए खोल दिया. जिसका नतीजा ये हुआ कि तेहरान फैशन का हब बन गया. कहते हैं उस दौर में फैशन पेरिस से पहले तेहरान में आने लगा था. अय्याशी का कोई ऐसा सामान नहीं थी जो ईरान की राजधानी में मुहैय्या ना हो.

90 फीसदी शिया मुस्लिम और करीब 9 फीसदी सुन्नी मुस्लिमों को शाह पहेलवी का ये खुला रूप बिलकुल भी नहीं भा रहा था. उनके मुताबिक अमेरिका के दबाव में शाह पहेलवी ने ना सिर्फ मुल्क को अमेरिका के सामने गिरवी कर दिया है बल्कि ईरान की तमीज़ और तहज़ीब का भी बेड़ा गर्क कर दिया. करीब 10 सालों तक ईरान को पश्चिमी रंग में बदलते हुए अपनी आंखों से देखने के बाद लोग शाह पहेलवी के खिलाफ सड़कों पर उतर आए और इन लोगों की अगुवाई इस्लामिक लीडर आयतुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी कर रहे थे.

शाह की सुरक्षा एजेंसियों ने फौरन आयतुल्लाह खुमैनी को गिरफ्तार कर लिया. और उन्हें 18 महीनों तक जेल में यात्नाएं दी गईं. 1964 में जेल से आज़ादी के लिए उनके सामने दो शर्तें रखी गईं. या तो वो शाह से माफी मांगे या देश छोड़ दें. आयतुल्लाह खुमैनी ने दूसरा रास्ता चुना और उन्हें देश से निकाल दिया गया. उस दिन के बाद से वो 14 साल ईरान से दूर रहे. पहले इराक, फिर तुर्की और फिर फ्रांस और इन सालों में खुमैनी वहीं से मोहम्मद रज़ा पहेलवी को सत्ता से बेदखल करने का खाका खींचते रहे.

साल 1971 में ईरानी शहर पर्सेपोलिस में शाह ने अपने दोस्त मुल्कों की शान में एक शानदार पार्टी रखी. इसमें यूगोस्लाविया, मोनाको, अमेरीका और सोवियत संघ से आए उनके सियासी दोस्तों ने शिरकत की. जिसमें ईरान में उठते विरोध के स्वर को कुचलने की रणनीति पर चर्चा की गई. शाह की इस पार्टी को निर्वासन झेल रहे ईरानी नेता आयतुल्लाह खुमैनी ने शैतानों को जश्न कहा. ये वो दौर था जब ईरानी जनता में शाह के खिलाफ गुस्सा और आयतुल्लाह खुमैनी में उम्मीद नज़र आ रही थी. फ्रांस में रहने के दौरान उनके संदेशों को मुल्क में पंपलेट और ऑडियो-वीडियो मैसेज के ज़रिए लोगों तक पहुंचाया जा रहा था.

जो काम आयतुल्लाह खुमैनी मुल्क में रहकर नहीं कर पाए. वो उन्होंने मुल्क से बाहर रहते हुए कर दिया. ईरान में हर तरफ एक ही सदा थी. आयतुल्लाह खुमैनी ज़िंदाबाद. शाह पहेलवी मुर्दाबाद. लेकिन ऐसा कतई नहीं था कि ईरान में जो कुछ हो रहा था उससे दुनिया ने आंख बंद कर ली थी. खासकर अमेरिका ने. शाह पहेलवी का ईरान की सत्ता पर काबिज़ रहना अमेरिका के लिए उतना ही ज़रूरी थी. जितना कि उसके लिए सुपरपावर बने रहना. वो इसलिए क्योंकि सुपर पावर बने रहने की असली पावर उसे ईरान और फारस की खाड़ी से मिल रही थी.